खबरीलाल डेस्क
मेरठ (विशेष रिपोर्ट):
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उत्तर प्रदेश के पश्चिमी अंचल के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU), मेरठ में प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पारदर्शी नियुक्तियों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विश्वविद्यालय परिसर में संचालित होने वाले स्ववित्तपोषित (Self-Financed) पाठ्यक्रमों और स्कीमों के तहत शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक पदों की भर्ती प्रक्रिया में संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था की अनदेखी करने का मामला तूल पकड़ चुका है।
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​इस पूरे प्रकरण में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for Scheduled Castes - NCSC), भारत सरकार ने कड़ा संज्ञान लेते हुए सीधे विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व यानी कुलपति (Vice-Chancellor) को आधिकारिक नोटिस जारी कर दिया है। आयोग की इस अप्रत्याशित और सख्त कार्रवाई के बाद से विश्वविद्यालय के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।
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​नोटिस का पूरा ब्यौरा: 15 दिनों में मांगा गया बिंदुवार जवाब

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​राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, नई दिल्ली (लोकनायक भवन) द्वारा जारी फाइल संख्या SSW-II/BE/UP/2026/341494 के तहत भेजे गए इस नोटिस में मामले की गंभीरता को रेखांकित किया गया है।
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​आयोग के अनुभाग अधिकारी (Section Officer) हेमंत कुमार भाटिया के हस्ताक्षरों से जारी इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि शिकायतकर्ता शशिकांत गौतम (निवासी: लेन नंबर 2, शिव शक्ति विहार, गढ़ रोड, मेरठ) द्वारा 18 अगस्त 2026 को प्रस्तुत किए गए विस्तृत पत्र और साक्ष्यों के आधार पर आयोग ने स्वयं मामले की निष्पक्ष जांच और पूछताछ (Investigate/Inquire) करने का निर्णय लिया है।
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नोटिस विवरण
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मुख्य बिंदु
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जारीकर्ता संस्था
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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC), भारत सरकार
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फाइल संख्या
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SSW-II/BE/UP/2026/341494
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प्राप्तकर्ता
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कुलपति, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (vc@ccsuniversity.ac.in)
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मूल शिकायतकर्ता
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शशिकांत गौतम (मेरठ)
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शिकायत का विषय
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स्ववित्तपोषित पदों पर नियुक्तियों में आरक्षण नियमों का उल्लंघन
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जवाब की समय-सीमा
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नोटिस प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर
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अनुच्छेद 338 के तहत सिविल कोर्ट की शक्तियां और समन की चेतावनी

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​राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने अपने नोटिस में केवल कागजी पत्राचार तक सीमित न रहते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़ा वैधानिक संदेश दिया है। आयोग ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 338 (Article 338 of the Constitution of India) का उल्लेख करते हुए स्मरण कराया है कि आयोग को किसी भी मामले की जांच करते समय देश की 'सिविल अदालत (Civil Court)' जैसी पूर्ण वैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।
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आयोग ने चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया है कि:

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    ​विश्वविद्यालय प्रशासन को 15 दिनों की निर्धारित समयावधि के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट (Action Taken Report) और सभी तथ्य प्रस्तुत करने होंगे।
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    ​यदि निर्धारित समय में संतोषजनक उत्तर और दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो आयोग अपनी शक्तियों का प्रयोग करेगा।
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    ​ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय के कुलपति या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत रूप से आयोग के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में उपस्थित होने के लिए 'समन' (Summons) जारी कर दिया जाएगा।
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​स्ववित्तपोषित (Self-Financed) पाठ्यक्रमों में आरक्षण का क्या है विवाद?

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​विश्वविद्यालयों में अक्सर 'स्ववित्तपोषित योजना' (SFS) के नाम पर नियमित भर्तियों से इतर पद सृजित किए जाते हैं। नियम यह कहता है कि चाहे पद नियमित सरकारी बजट से हों या स्ववित्तपोषित मद से, यदि वे किसी राज्य विश्वविद्यालय या संवैधानिक संस्था के अधीन आते हैं, तो उनमें राज्य सरकार और केंद्र सरकार की आरक्षण नीतियों का शत-प्रतिशत पालन होना अनिवार्य है।
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​हालांकि, आरोप है कि CCSU में स्ववित्तपोषित विभागों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और गैर-शैक्षणिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया के दौरान आरक्षण रोस्टर को दरकिनार किया गया। इसके चलते अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़े वर्गों के योग्य अभ्यर्थियों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित होना पड़ा। शिकायतकर्ता शशिकांत गौतम ने इन्हीं खामियों के पुख्ता प्रमाण जुटाकर आयोग के समक्ष याचिका दायर की थी।
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​"संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अंत तक लड़ेंगे" - शिकायतकर्ता का रुख

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​इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शिकायतकर्ता शशिकांत गौतम ने कहा:
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"विश्वविद्यालय जैसे विद्या के मंदिर में यदि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की बलि चढ़ाई जाएगी, तो इसे चुपचाप बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। स्ववित्तपोषित पदों के नाम पर आरक्षण रोस्टर में हेरफेर करके मनपसंद लोगों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ी जीत है। हमें पूरा विश्वास है कि जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी और पीड़ित वर्गों को उनका न्यायसंगत हक मिलेगा।"
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​आगे क्या? विश्वविद्यालय के पास बचे क्या विकल्प?

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​राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के इस कड़े रुख के बाद अब पूरी गेंद चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले में है। विश्वविद्यालय के पास अब केवल 15 दिनों का समय है। इस दौरान विश्वविद्यालय को:
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    ​स्ववित्तपोषित पदों पर हुई नियुक्तियों का पूरा रोस्टर रजिस्टर सार्वजनिक करना होगा।
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    ​आरक्षण श्रेणीवार विज्ञापित पदों और चयनित अभ्यर्थियों का पूरा विवरण आयोग को भेजना होगा।
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    ​यदि आयोग विश्वविद्यालय के जवाब से असंतुष्ट रहता है, तो विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों को दिल्ली तलब किया जा सकता है, जिससे विश्वविद्यालय की साख पर गहरा असर पड़ सकता है।
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यह मामला केवल मेरठ विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहने वाला है; इसका असर उत्तर प्रदेश के अन्य तमाम राज्य विश्वविद्यालयों पर भी पड़ेगा जहाँ स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में आरक्षण रोस्टर के क्रियान्वयन को लेकर लंबे समय से अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं।
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अस्वीकरण (Disclaimer): यह समाचार रिपोर्ट राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, भारत सरकार द्वारा जारी आधिकारिक नोटिस (File No. SSW-II/BE/UP/2026/341494) और शिकायतकर्ता द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है। इस मामले में संबंधित विश्वविद्यालय या अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी निष्पक्षता से प्रकाशित किया जाएगा।
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