नई दिल्ली (Tech Desk): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence - AI) के दौर में जहां तकनीक ने इंसान की जिंदगी आसान की है, वहीं 'डीपफेक' (Deepfake) और भ्रामक जानकारियों ने समाज के सामने एक भयावह चुनौती खड़ी कर दी है. इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. केंद्र सरकार ने इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में बड़ा और सख्त संशोधन किया है.READ ALSO:-WhatsApp Web का 'गेम चेंजर' अपडेट: अब ब्राउजर से ही होंगी HD वीडियो और वॉयस कॉल्स, डेस्कटॉप ऐप को कहिए अलविदा!
यह संशोधन विशेष रूप से इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर AI द्वारा जनरेट किए जाने वाले फर्जी, भ्रामक और सिंथेटिक कंटेंट पर लगाम लगाने के लिए किया गया है. सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, ये IT नियम संशोधन 2026 (IT Rules Amendment 2026) आगामी 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो जाएंगे. इन नियमों के लागू होने के बाद सोशल मीडिया कंपनियों (जैसे Facebook, Instagram, X, YouTube) की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाएगी और कोताही बरतने पर उन्हें भारी कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.
क्या है नया '3 घंटे' का नियम?
इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू "समय सीमा" है. अब तक सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज (बिचौलियों) के पास किसी भी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए 36 घंटे का समय होता था. लेकिन IT नियम संशोधन 2026 के तहत, एआई और डीपफेक के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस समय सीमा को घटाकर मात्र 3 घंटे कर दिया गया है.
नए नियमों के मुताबिक, यदि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सरकार या किसी पीड़ित पक्ष से यह सूचना मिलती है कि उनके प्लेटफॉर्म पर कोई अवैध, भ्रामक या किसी की छवि खराब करने वाला एआई जनरेटेड कंटेंट (AI Generated Content) मौजूद है, तो उन्हें शिकायत मिलने के 3 घंटे के भीतर उसे हटाना अनिवार्य होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि डीपफेक वीडियो या ऑडियो के वायरल होने की गति (Virality) बहुत तेज होती है. 36 घंटे का समय बहुत ज्यादा था, क्योंकि तब तक वह कंटेंट लाखों लोगों तक पहुंचकर नुकसान पहुंचा चुका होता था. 3 घंटे की समय सीमा डिजिटल दुनिया में 'गोल्डन ऑवर' की तरह काम करेगी.
'सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन' की नई परिभाषा
सरकार ने पहली बार कानूनी रूप से 'सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन' (Synthetically Generated Information) को परिभाषित किया है. इसका सीधा संबंध उन सामग्रियों से है जो हकीकत नहीं हैं, बल्कि कंप्यूटर एल्गोरिद्म या एआई के जरिए तैयार की गई हैं.
इस परिभाषा के दायरे में निम्नलिखित चीजें आएंगी:
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डीपफेक वीडियो: जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा या आवाज बदलकर उसे कुछ ऐसा करते या बोलते हुए दिखाया जाए जो उसने कभी किया ही नहीं.
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वॉयस क्लोनिंग: एआई के जरिए किसी की आवाज की हूबहू नकल करना.
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मॉर्फ्ड इमेज: किसी की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ कर उसे अश्लील या आपत्तिजनक बनाना.
अधिसूचना में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसी कोई भी सामग्री जो "वास्तविक दिखती हो" और किसी व्यक्ति या घटना को इस तरह पेश करती हो कि आम यूजर उसे असली समझ ले, वह इस कानून के दायरे में आएगी.
DIG स्तर के अधिकारी ही दे सकेंगे आदेश
सरकार ने इस बात का भी ध्यान रखा है कि कानून का दुरुपयोग न हो और अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) बनी रहे. इसलिए, कानून-व्यवस्था (Law and Order) से जुड़ी किसी सूचना या कंटेंट को हटाने का अनुरोध केवल पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी द्वारा ही किया जा सकेगा.
इसका मतलब है कि स्थानीय थानेदार या निचले स्तर के अधिकारी सीधे सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट हटाने का आदेश नहीं दे सकेंगे, जब तक कि मामला अत्यंत गंभीर न हो और उच्च अधिकारियों द्वारा अनुमोदित न हो. यह चेक-एंड-बैलेंस सिस्टम यह सुनिश्चित करेगा कि सेंसरशिप का अनावश्यक उपयोग न हो.
हर 3 महीने में यूजर्स को देनी होगी चेतावनी
IT नियम संशोधन 2026 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही सिर्फ कंटेंट हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें अपने यूजर्स को शिक्षित भी करना होगा. नए नियमों में यह प्रावधान किया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को साल में कम से कम चार बार (यानी हर 3 महीने में) अपने यूजर्स को नियमों और कानूनों की जानकारी देनी होगी.
यह जानकारी सिर्फ नियम और शर्तें (Terms & Conditions) बदलने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि कंपनियों को स्पष्ट शब्दों में यूजर्स को बताना होगा कि:
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भारत में कौन से कंटेंट गैर-कानूनी हैं.
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एआई से तैयार अवैध सामग्री शेयर करने पर क्या सजा हो सकती है.
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भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023, आईटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत क्या प्रावधान हैं.
सरकार का मकसद है कि सोशल मीडिया यूजर्स यह न कह सकें कि उन्हें कानून की जानकारी नहीं थी. "Ignorance of law is not an excuse" (कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है) के सिद्धांत को डिजिटल दुनिया में सख्ती से लागू किया जा रहा है.
AI कंटेंट पर 'डिजिटल मुहर' (Labeling & Metadata)
नए नियमों का एक और क्रांतिकारी हिस्सा 'टेक्निकल कंप्लायंस' है. अब सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी तकनीक को अपग्रेड करना होगा.
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लेबलिंग (Labeling): अगर कोई कंटेंट एआई से बना है, तो उस पर साफ-साफ लिखा होना चाहिए "AI Generated" या "Synthetically Created". यह लेबल ऐसा होना चाहिए जो यूजर को आसानी से दिखाई दे.
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मेटाडेटा (Metadata) और वाटरमार्क: कंपनियों को कंटेंट में एक ऐसा स्थाई डिजिटल पहचान चिह्न (Permanent Digital Identity) या मेटाडेटा जोड़ना होगा जिसे हटाया न जा सके. इससे यह पता लगाना आसान होगा कि वह कंटेंट किस सॉफ्टवेयर से बना है, किसने बनाया है और पहली बार कहां अपलोड किया गया था.
यह नियम ठीक वैसा ही है जैसे खाने के पैकेट पर 'शाकाहारी' या 'मांसाहारी' का निशान होता है, ताकि उपभोक्ता को पता हो कि वह क्या देख या सुन रहा है.
प्रतिबंधित सामग्री की सूची (Prohibited Content)
सरकार ने उन श्रेणियों को भी स्पष्ट कर दिया है जिनके तहत एआई कंटेंट को तुरंत रोका या हटाया जाना चाहिए. IT नियम संशोधन 2026 के अनुसार, निम्नलिखित प्रकार के कंटेंट पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी:
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CSAM (Child Sexual Abuse Material): बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी कोई भी एआई जनरेटेड सामग्री.
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नॉन-कंसेंशुअल इंटिमेट इमेजरी (NCII): किसी भी व्यक्ति (विशेषकर महिलाओं) की सहमति के बिना बनाई गई अश्लील या निजी तस्वीरें/वीडियो.
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फर्जी दस्तावेज: एआई का इस्तेमाल करके बनाए गए जाली आधार कार्ड, पासपोर्ट या सरकारी दस्तावेज.
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हिंसा और हथियार: दंगों को भड़काने वाले वीडियो या हथियारों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली फर्जी क्लिप्स.
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डीपफेक प्रेजेंटेशन: किसी राजनेता, सेलिब्रिटी या आम नागरिक का ऐसा वीडियो जो उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करता हो.
कंपनियों की कानूनी सुरक्षा पर खतरा
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह 'करो या मरो' की स्थिति है. आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) की सुरक्षा मिलती है. इसका मतलब है कि अगर कोई यूजर उनके प्लेटफॉर्म पर कुछ गलत पोस्ट करता है, तो कंपनी उसके लिए जिम्मेदार नहीं होगी.
लेकिन, IT नियम संशोधन 2026 में साफ कर दिया गया है कि अगर कंपनियां नए नियमों (जैसे 3 घंटे में कंटेंट हटाना, लेबलिंग करना) का पालन नहीं करती हैं, तो उनकी यह कानूनी सुरक्षा (Immunity) खत्म हो जाएगी. इसके बाद, यूजर द्वारा पोस्ट किए गए किसी भी अवैध कंटेंट के लिए कंपनी पर भी मुकदमा चलाया जा सकेगा और भारी जुर्माना लगाया जा सकेगा.
भारतीय न्याय संहिता 2023 का समावेश
चूंकि भारत में अब औपनिवेशिक काल की 'भारतीय दंड संहिता' (IPC) की जगह 'भारतीय न्याय संहिता 2023' (BNS) लागू हो चुकी है, इसलिए नए आईटी नियमों में भी इसे अपडेट किया गया है. अब यूजर्स को दी जाने वाली चेतावनियों में BNS की धाराओं का जिक्र होगा.
उदाहरण के लिए:
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किसी की पहचान चोरी करना.
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मानहानि.
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धार्मिक भावनाओं को आहत करना.
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देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाना.
इन सभी अपराधों के लिए अब BNS 2023 के तहत सजा होगी, और सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका प्लेटफॉर्म इन अपराधों का अड्डा न बने.
क्यों पड़ी इन नियमों की जरूरत? (The Background)
साल 2023 और 2024 में भारत ने डीपफेक के कई हाई-प्रोफाइल मामले देखे. रश्मिका मंदाना, सचिन तेंदुलकर और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डीपफेक वीडियो वायरल हुए थे. इसके अलावा, आम चुनावों के दौरान भी मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए एआई का दुरुपयोग देखा गया था.
कई मामलों में देखा गया कि जब तक पुलिस या साइबर सेल कार्रवाई करती, तब तक वीडियो करोड़ों बार देखा जा चुका होता था. पीड़ित व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पूरी तरह बर्बाद हो जाती थी. इन्ही समस्याओं को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने व्यापक विचार-विमर्श के बाद इन कड़े नियमों को तैयार किया है.
यूजर्स पर क्या होगा असर?
आम इंटरनेट यूजर्स के लिए IT नियम संशोधन 2026 के मायने काफी गहरे हैं:
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सत्यापन की जिम्मेदारी: अब अगर आप कोई मजेदार एआई वीडियो या मीम शेयर करते हैं, तो आपको यह घोषित करना पड़ सकता है कि यह एआई से बना है.
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सुरक्षा: अगर आप किसी ऑनलाइन ठगी या डीपफेक ब्लैकमेलिंग का शिकार होते हैं, तो अब आपको त्वरित न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ गई है. 3 घंटे का नियम आपकी प्रतिष्ठा बचा सकता है.
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जागरूकता: अब आपके सोशल मीडिया फीड पर आपको बार-बार कानूनी चेतावनियों का सामना करना पड़ेगा, जो आपको सतर्क रखेंगी.
वैश्विक परिदृश्य और भारत की पहल
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो एआई को रेगुलेट कर रहा है. यूरोपीय संघ (EU) ने अपना 'AI Act' लागू किया है, और अमेरिका में भी कार्यकारी आदेश जारी किए गए हैं. लेकिन भारत का IT नियम संशोधन 2026 कंटेंट हटाने की समय सीमा (3 घंटे) के मामले में दुनिया के सबसे सख्त कानूनों में से एक है. यह दर्शाता है कि भारत सरकार डिजिटल नागरिकों (Digital Nagriks) की सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है.
विशेषज्ञों की राय
साइबर कानून विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विराज गुप्ता कहते हैं:
"3 घंटे की समय सीमा एक साहसिक कदम है. यह सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी एल्गोरिद्म और मॉडरेशन टीमों को दुरुस्त करने पर मजबूर करेगा. हालांकि, चुनौती यह होगी कि क्या कंपनियां इतनी जल्दी सही और गलत का फैसला कर पाएंगी? कहीं जल्दबाजी में सही कंटेंट तो नहीं हट जाएगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा."
वहीं, तकनीकी विशेषज्ञ निखिल पाहवा का मानना है:
"एआई लेबलिंग और मेटाडेटा जोड़ना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे लागू करना तकनीकी रूप से जटिल होगा, खासकर ओपन-सोर्स एआई टूल्स के लिए जो किसी के नियंत्रण में नहीं हैं."
IT नियम संशोधन 2026 भारत के डिजिटल इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है. यह संशोधन स्पष्ट संदेश देता है कि "तकनीक समाज के भले के लिए है, अपराध के लिए नहीं." 20 फरवरी 2026 से जब ये नियम लागू होंगे, तो उम्मीद की जा सकती है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाले झूठ और फरेब के काले कारोबार पर काफी हद तक लगाम लगेगी.
अब गेंद सोशल मीडिया कंपनियों के पाले में है. उन्हें साबित करना होगा कि वे भारतीय कानूनों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का सम्मान करते हैं. वहीं, एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हमें भी यह संकल्प लेना होगा कि हम बिना जांचे-परखे किसी भी कंटेंट को फॉरवर्ड नहीं करेंगे.
केंद्र सरकार ने आईटी नियमों में संशोधन कर डीपफेक और एआई जनरेटेड फर्जी कंटेंट पर शिकंजा कस दिया है. नए नियम 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. सोशल मीडिया कंपनियों को शिकायत मिलने के 3 घंटे के भीतर कंटेंट हटाना होगा, अन्यथा उन पर कानूनी कार्रवाई होगी. साथ ही, एआई कंटेंट पर लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है.
IT नियम संशोधन 2026 के 5 बड़े स्तंभ
लेख को और अधिक गहराई देने के लिए, आइए इन नए संशोधनों के 5 प्रमुख स्तंभों पर विस्तार से नजर डालें:
1. जवाबदेही का नया ढांचा
पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स खुद को केवल एक 'पाइपलाइन' मानते थे, जिनका काम सिर्फ डेटा इधर से उधर करना था. लेकिन IT नियम संशोधन 2026 ने उन्हें 'गेटकीपर' बना दिया है. अब उन्हें सक्रिय रूप से यह देखना होगा कि उनके प्लेटफॉर्म पर क्या परोसा जा रहा है.
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प्रमुख बदलाव: पहले "Best Effort" (सर्वोत्तम प्रयास) की बात होती थी, अब "Compliance" (अनुपालन) की बात है.
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परिणाम: अगर कोई डीपफेक वीडियो वायरल होता है, तो कंपनी यह कहकर नहीं बच सकती कि "हमें पता नहीं था". उन्हें तकनीकी फिल्टर लगाने ही होंगे.
2. 'डिजिटल अरेस्ट' और साइबर ठगी पर वार
हाल के दिनों में 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) और वॉयस क्लोनिंग के जरिए ठगी के मामले बढ़े हैं. अपराधी एआई का इस्तेमाल कर वीडियो कॉल पर पुलिस अधिकारी का चेहरा लगा लेते हैं.
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नए नियमों के तहत, जैसे ही पुलिस या जांच एजेंसी (DIG रैंक) ऐसे किसी वीडियो या अकाउंट की जानकारी देगी, उसे 3 घंटे में ब्लॉक करना होगा.
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इससे ठगों को अपना नेटवर्क फैलाने का समय नहीं मिलेगा और पीड़ितों का पैसा बचने की संभावना बढ़ जाएगी.
3. चुनाव और लोकतंत्र की सुरक्षा
लोकतंत्र में सही सूचना ऑक्सीजन की तरह होती है. एआई और डीपफेक का सबसे खतरनाक इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने में हो सकता है. फर्जी भाषण, झूठे बयान या किसी नेता की छवि खराब करने वाले वीडियो मतदाताओं को गुमराह कर सकते हैं.
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IT नियम संशोधन 2026 के तहत राजनेताओं और चुनाव आयोग को भी यह अधिकार मिलेगा कि वे ऐसे भ्रामक प्रचार को तुरंत हवा से गायब करवा सकें.
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यह भारतीय लोकतंत्र की अखंडता के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करेगा.
4. क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स पर प्रभाव
यह कानून सिर्फ कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी है.
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अगर आप एक यूट्यूबर या रील मेकर हैं और एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको डिस्क्लेमर (Disclaimer) देना होगा.
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बिना डिस्क्लेमर के एआई कंटेंट पोस्ट करने पर आपका अकाउंट सस्पेंड हो सकता है या आप पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
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यह नियम 'ओरिजिनल क्रिएटर्स' के अधिकारों की भी रक्षा करेगा, जिनकी आवाज या चेहरे का इस्तेमाल बिना अनुमति के किया जाता है.
5. शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism)
नियमों में शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Officer) की भूमिका को और सशक्त बनाया गया है.
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अब यूजर्स को शिकायत करने का एक आसान और सीधा विकल्प देना होगा.
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शिकायत का निपटारा एक निश्चित समय सीमा (जो अब और कम हो गई है) के भीतर करना होगा और यूजर को बताना होगा कि क्या कार्रवाई की गई.
भविष्य की राह
20 फरवरी 2026 से लागू होने वाले ये नियम एक शुरुआत भर हैं. जैसे-जैसे एआई तकनीक और उन्नत होगी, चुनौतियां और बढ़ेंगी. हो सकता है कि भविष्य में सरकार को 'एआई एथिक्स' (AI Ethics) पर एक अलग से व्यापक कानून लाना पड़े.
फिलहाल के लिए, IT नियम संशोधन 2026 एक स्वागत योग्य कदम है जो यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक इंसान पर हावी न हो, बल्कि इंसान तकनीक को नियंत्रित करे. यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम इन नियमों के प्रति जागरूक रहें और एक सुरक्षित डिजिटल भारत के निर्माण में सहयोग करें.
महत्वपूर्ण जानकारी: यदि आपको इंटरनेट पर कोई आपत्तिजनक या डीपफेक सामग्री मिलती है, तो आप तुरंत 1930 (साइबर हेल्पलाइन) पर कॉल कर सकते हैं या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं.