कई लोगों ने कहा कि वे चेतावनी से ज्यादा किस्मत की वजह से बच पाए। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ आने का खतरा लंबे समय से मौजूद था। इसके बावजूद इस जोखिम की लगातार निगरानी नहीं की गई।
नेपाल पुलिस के मुताबिक, बाढ़ में अब तक 1127 लोगों की मौत हो चुकी है। 4600 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। बाढ़ में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सड़कें, पुल, स्कूल और अस्पताल को नुकसान पहुंचा है।
दर्जनों हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के सैकड़ों कर्मचारी अब भी लापता हैं। कई लोगों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है।
जानिए भास्कर नॉलेज में
सवालः अर्ली वार्निंग सिस्टम कैसे काम करता है?
जवाबः अर्ली वार्निंग सिस्टम में चार चीजें अहम हैं- खतरे की पहचान, लगातार निगरानी, लोगों तक तुरंत अलर्ट पहुंचाना और सुरक्षित निकासी की तैयारी। सेंसर, सैटेलाइट और ऑटोमेटेड स्टेशन पानी के स्तर और बहाव में बदलाव पकड़ते हैं। इसके बाद सायरन या मोबाइल अलर्ट के जरिए लोगों को चेतावनी दी जाती है।
सवालः नेपाल में अलर्ट में 38 मिनट की देरी क्यों हुई?
जवाबः इसका एक बड़ा कारण आपदा की रफ्तार थी। ग्लेशियर टूटने और भूस्खलन से अचानक आई फ्लैश फ्लड बहुत तेजी से नीचे आई। इसके अलावा नेपाल-तिब्बत के बीच सीमा-पार सूचना साझा करने में भी समय लगा। नेपाल का मौजूदा सिस्टम धीमी गति से आने वाली बाढ़ के मुकाबले ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ के लिए कम तैयार था।