खबरीलाल टीम
नई दिल्ली/वाशिंगटन: भू-राजनीतिक (Geo-political) मोर्चे पर अमेरिका से एक ऐसी खबर आई है जिसने रातों-रात पूरी दुनिया के शेयर बाजारों और कमोडिटी मार्केट की नींद उड़ा दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने मध्य पूर्व (Middle East) में सख्त रुख अपनाते हुए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्ग, 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में अचानक नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) की घोषणा कर दी है।Read also:-मेरठ के सेंट्रल मार्केट में महिलाओं का हल्ला बोल: आवास विकास की 'भेदभावपूर्ण' कार्रवाई के खिलाफ सड़क पर उतरीं माताएं-बहनें, प्रशासन को अल्टीमेटम

 

इस एक फैसले ने वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन को लेकर ऐसा खौफ पैदा किया है कि एशियाई शेयर बाजार धड़ाम हो गए हैं और निवेशकों में अफरा-तफरी (Panic Selling) का माहौल बन गया है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए $100 प्रति बैरल का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया है। आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि यह नाकेबंदी लंबी खिंचती है, तो 2008 जैसी वैश्विक मंदी और भयंकर महंगाई का दौर वापस लौट सकता है।

 

आखिर क्यों मची है खलबली? 'होर्मुज' का रणनीतिक महत्व

इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को समझना जरूरी है। ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के बीच स्थित यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया की 'आर्थिक शह रग' (Jugular Vein) माना जाता है। दुनिया भर में समुद्री मार्ग से होने वाले कुल तेल व्यापार का लगभग 20% से 30% हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई (UAE) और कुवैत जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश इसी मार्ग पर निर्भर हैं। ट्रंप द्वारा यहां अमेरिकी नौसेना (US Navy) के जंगी जहाजों को तैनात कर नाकेबंदी करने का सीधा अर्थ है—वैश्विक तेल की सप्लाई लाइन (Supply Chain) को चोक (Choke) कर देना। इसी खौफ ने तेल की कीमतों में आग लगा दी है।

 

बाजार विशेषज्ञों की चेतावनी: "ग्लोबल मार्केट में आएगी भारी अस्थिरता"

इस अप्रत्याशित संकट पर बैंकिंग और शेयर बाजार के दिग्गज विशेषज्ञ अजय बग्गा (Ajay Bagga) ने समाचार एजेंसी ANI (एएनआई) से बातचीत में बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की है।

 

  • आपूर्ति में भयंकर बाधा: अजय बग्गा ने कहा, "अगर कूटनीतिक बातचीत नाकाम होती है और ट्रंप प्रशासन इस नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह से लागू करता है, तो होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए लगभग बंद हो जाएगा। इससे तेल की ग्लोबल सप्लाई पर इतना बड़ा असर पड़ेगा जिसकी भरपाई रातों-रात संभव नहीं है।"
  • निवेशकों के लिए रिस्क: उन्होंने आगे चेतावनी दी कि इस समय बाजार में भारी उतार-चढ़ाव (High Volatility) का दौर है। हालात बिगड़ने पर तनाव और बढ़ सकता है। बड़े हेज फंड (Hedge Funds) और संस्थागत निवेशक (FIIs) तो 'शॉर्ट सेलिंग' (Short Selling) या तेल के वायदा बाजार (Future Market) से मुनाफा कमा सकते हैं, लेकिन आम (Retail) निवेशकों के लिए यह समय बेहद जोखिम भरा है। तेजी से बदलते इस बाजार में हड़बड़ी में लिया गया एक गलत फैसला आपकी पूरी पूंजी डुबो सकता है, इसलिए इस समय 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) और अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता है।

 

भारत के लिए खतरे की घंटी: महंगाई का फटेगा 'बम'

अमेरिका और मध्य पूर्व की इस रस्साकशी का सबसे बड़ा और सीधा शिकार भारत होने जा रहा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का लगभग 80% से 85% कच्चा तेल आयात (Import) करता है।

 

1. आयात बिल (Import Bill) और रुपये पर दबाव: क्रूड ऑयल का भाव $100 प्रति बैरल के पार जाने का सीधा मतलब है कि भारत का तेल आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) खर्च होगा और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया (Indian Rupee) भारी दबाव में आकर कमजोर होगा। 2. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग: अगर सरकार ने एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में कटौती कर इस झटके को एब्जॉर्ब नहीं किया, तो घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 100 से 110 रुपये के पार स्थिर हो सकती हैं। 3. आम आदमी की थाली पर असर: डीजल महंगा होने का सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन लागत (Freight cost) पर पड़ता है। लॉजिस्टिक्स का खर्च बढ़ते ही फल, सब्जियां, दूध, अनाज और एफएमसीजी (FMCG) से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल की हर चीज महंगी हो जाएगी। यानी आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) का ग्राफ तेजी से ऊपर भागेगा, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए नई सिरदर्दी पैदा करेगा।

 

व्यापारिक झटका: भारत के 20% निर्यात (Exports) पर लगा ब्रेक

इस संकट ने केवल आयात ही नहीं, बल्कि भारत के निर्यात (Exports) को भी बुरी तरह से झकझोर दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, इस जियो-पॉलिटिकल तनाव का असर अब भारत के बाहरी व्यापार के आंकड़ों पर साफ दिखने लगा है।

 

नाकेबंदी और सैन्य तनाव के कारण लाल सागर (Red Sea) और ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) के रास्ते होने वाली शिपिंग (Shipping) में भारी दिक्कतें आ रही हैं। मालवाहक जहाजों (Cargo Ships) को या तो रोक दिया गया है या उन्हें 'केप ऑफ गुड होप' (अफ्रीका के नीचे से) का लंबा और महंगा रास्ता लेना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप:

 

  • शिपिंग कंपनियों ने कंटेनर का किराया (Freight Charges) कई गुना बढ़ा दिया है।
  • मरीन इंश्योरेंस (Marine Insurance) का प्रीमियम आसमान छू रहा है।
  • इन सब वजहों से भारत के कुल निर्यात पर लगभग 20% की भारी गिरावट (Hit) देखने को मिली है, जिससे टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स और जेम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

 

रेमिटेंस पर प्रहार: खाड़ी से भारत लौट रहे 9 लाख कामगार

यह संकट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, इसने खाड़ी (Gulf) देशों में पसीना बहा रहे लाखों भारतीयों के परिवारों पर भी सीधा प्रहार किया है। मध्य पूर्व के देशों (सऊदी अरब, यूएई, कतर आदि) में लगभग 1 करोड़ (10 Million) भारतीय काम करते हैं, जो हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा (Remittance) भारत भेजते हैं।

 

लेकिन इस युद्ध जैसे तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के कारण वहां कई बड़े प्रोजेक्ट्स रुक गए हैं।

 

  • छंटनी का दौर: रिपोर्ट के अनुसार, अब तक लगभग 9 लाख लोग नौकरी छूटने के कारण भारत लौट चुके हैं या लौटने की प्रक्रिया में हैं।
  • प्रभावित सेक्टर: सबसे ज्यादा असर कंस्ट्रक्शन (निर्माण कार्य) और 'गिग सेक्टर' (Gig Economy/अस्थायी रोजगार) पर पड़ा है, जहां छंटनी सबसे तेज हुई है।
  • केरल जैसे राज्यों पर संकट: विदेश से भारत आने वाले पैसे (Remittance) में इस भारी कमी का सबसे ज्यादा और सीधा असर केरल (Kerala) जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिनकी जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर है। इस रिवर्स माइग्रेशन (Reverse Migration) से देश में भी बेरोजगारी का दबाव अचानक बढ़ जाएगा।

 

क्या है आगे का रास्ता?

अगर होर्मुज जलडमरूमध्य का यह तनाव कूटनीतिक वार्ताओं (Diplomatic Talks) के जरिए जल्द खत्म नहीं होता है, तो इसके परिणाम भयावह और दीर्घकालिक (Long-term) होंगे। दुनिया भर में आर्थिक विकास (Global GDP Growth) की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी, मंदी (Recession) की आहट तेज होगी और महंगाई हर घर का बजट बिगाड़ देगी।

 

भारत के लिए यह समय कूटनीतिक रूप से सतर्क रहने और आर्थिक मोर्चे पर बेहद सधे हुए और सही फैसले लेने का है। सरकार को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) का समझदारी से उपयोग करना होगा और वैकल्पिक ऊर्जा व सप्लाई चेन के नए रास्ते तलाशने होंगे, ताकि इस अंतरराष्ट्रीय संकट की आंच से देश के आम नागरिक को कुछ हद तक बचाया जा सके।
विज्ञापन
dhss