खबरीलाल टीम
वाशिंगटन डीसी/नई दिल्ली: पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आ रही है। महीनों से मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में चल रहे भयंकर तनाव और युद्ध के बाद अब शांति की किरण नजर आने लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद अहम और बड़ा दावा करते हुए कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने का समझौता अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और यह 'लगभग फाइनल' हो गया है।READ ALSO:-होटल वालों को 'वायरल' करने की धमकी देकर लूटता था ये 'फर्जी संगठन', नजीबाबाद पुलिस ने बिछाया ऐसा जाल कि पति-पत्नी समेत 4 गिरफ्तार

 

वर्तमान में दोनों देशों के शीर्ष राजनयिक और अधिकारी इस समझौते की आखिरी डिटेल्स (Final Details) और बारीकियों पर काम कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक शांति समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए खाड़ी देशों के बड़े नेताओं और इजरायली प्रधानमंत्री के साथ गहन विचार-विमर्श किया गया है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त इस समझौते पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और वैश्विक महंगाई पर पड़ने वाला है।

 

ओवल ऑफिस से ट्रंप की 'मेगा डिप्लोमेसी': मुस्लिम देशों के नेताओं से की जॉइंट कॉल

इस समझौते को मुकम्मल करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के पावर सेंटर यानी 'ओवल ऑफिस' से एक अभूतपूर्व कूटनीतिक पहल की। उन्होंने मिडिल ईस्ट और अन्य प्रमुख मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ एक जॉइंट कॉल के जरिए लंबी बातचीत की। इस उच्च स्तरीय टेलीफोनिक वार्ता का उद्देश्य सभी हितधारकों (Stakeholders) को एक मंच पर लाना और शांति प्रक्रिया पर मुहर लगाना था।

 

ट्रंप की इस अहम बातचीत में निम्नलिखित वैश्विक नेता शामिल हुए:

  • सऊदी अरब: क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS)
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE): राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान
  • कतर: अमीर तमीम बिन हमद अल थानी (कतर हमेशा से मध्यस्थ की अहम भूमिका निभाता रहा है)
  • पाकिस्तान: सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर
  • तुर्की: राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन
  • मिस्र: राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी
  • जॉर्डन: राजा अब्दुल्ला द्वितीय
  • बहरीन: राजा हमद बिन ईसा अल खलीफा

 

इन मुस्लिम देशों के शीर्ष नेताओं को विश्वास में लेने के साथ-साथ, डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से अलग से एक लंबी और गोपनीय बातचीत की। इजरायल इस पूरे संघर्ष का एक मुख्य केंद्र बिंदु रहा है, इसलिए नेतन्याहू की सहमति के बिना कोई भी शांति समझौता संभव नहीं था।

 

'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) का फिर से खुलना: वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी

इस पूरे शांति समझौते का सबसे अहम और आर्थिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है— स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का फिर से खोला जाना।

 

डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि समझौते की मुख्य शर्तों में इस समुद्री रास्ते को तुरंत प्रभाव से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोलना शामिल है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के लिए एक 'इकोनॉमिक लाइफलाइन' (आर्थिक जीवनरेखा) की तरह है।

 

क्यों इतना अहम है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज? दुनिया भर में सप्लाई होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग पांचवां हिस्सा (करीब 20%) इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, और इराक जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का ज्यादातर तेल निर्यात इसी मार्ग से होता है। जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने इस रास्ते को ब्लॉक कर दिया था या यहां से गुजरने वाले जहाजों पर खतरा मंडरा रहा था।

 

इस रास्ते के बंद होने से दुनिया भर में सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई थी। लेकिन अब, ट्रंप के इस दावे के बाद कि यह जलमार्ग फिर से खुलेगा, कमोडिटी मार्केट में भारी हलचल है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोमवार को जब बाजार खुलेंगे, तो क्रूड ऑयल की कीमतों में एक बड़ी और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा सकती है।

 

कच्चे तेल (Crude Oil) का गणित और भारत पर इसका असर

युद्ध के इन महीनों में कच्चे तेल के बाजार ने भारी उतार-चढ़ाव देखा है। आइए नजर डालते हैं कीमतों के सफर पर:

 

  • युद्ध से पहले (28 फरवरी से पूर्व): जब हालात सामान्य थे, तब कच्चा तेल लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था।
  • युद्ध के चरम पर (मार्च-अप्रैल): अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हवाई हमलों के बाद सप्लाई की चिंताओं के कारण दाम आसमान छूने लगे और 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए।
  • सीजफायर के बाद: अप्रैल में हुए सीजफायर के ऐलान के बाद कीमतों में नरमी आई और यह 100 डॉलर से नीचे आ गया।
  • वर्तमान स्थिति: अभी ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) 103 डॉलर प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा है।

 

शांति समझौते की खबर के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि क्रूड ऑयल वापस 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ सकता है। भारत के लिए फायदे की बात: भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल सस्ता होता है, तो भारत का आयात बिल काफी कम हो जाएगा। इससे भारतीय बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे आम जनता को महंगाई से बड़ी राहत मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

 

ईरान का शक बरकरार: "अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता"

भले ही अमेरिका की तरफ से शांति के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन ईरान के खेमे में अभी भी संशय और अविश्वास का माहौल है। एक तरफ जहां मतभेदों को सुलझाने के लिए पाकिस्तान का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल तेहरान में मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ ईरानी नेतृत्व ट्रंप प्रशासन की नीयत पर सवाल उठा रहा है।

 

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने मीडिया को संबोधित करते हुए एक बेहद नपा-तुला बयान दिया। उन्होंने कहा, "हम यह कह सकते हैं कि हम इस समझौते के बहुत करीब भी हैं और अभी बहुत दूर भी। अतीत में हमारे पास अमेरिकी पक्ष का बहुत ही खराब अनुभव रहा है। अमेरिका अक्सर अपनी ही बातों का खंडन करता है और रातों-रात अपना रुख बदल लेता है। हम पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकते कि अमेरिका का यह सकारात्मक नजरिया कल फिर नहीं बदलेगा।"

 

ईरान का यह शक निराधार नहीं है। अतीत में भी अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा खुद को अलग कर लिया था, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा हो गई थी।

 

न्यूक्लियर प्रोग्राम: वो पेंच जो अभी भी अनसुलझा है

डोनाल्ड ट्रंप ने जंग खत्म करने का दावा तो कर दिया है, लेकिन कुछ सबसे जटिल और विवादित मुद्दों पर स्थिति अभी भी पूरी तरह से साफ नहीं है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा है— ईरान का परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program)।

 

इजरायल और अमेरिका हमेशा से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं। इजरायल की मांग रही है कि शांति समझौते में ईरान की परमाणु सुविधाओं को पूरी तरह से नष्ट करने या उन पर कड़ी अंतरराष्ट्रीय निगरानी की शर्त होनी चाहिए। दूसरी ओर, ईरान हमेशा से दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है।

 

मौजूदा शांति समझौते के मसौदे (Draft) में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर क्या सहमति बनी है, इसका कोई भी विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। जब तक इस मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की गारंटी देना जल्दबाजी होगी।

 

फ्लैशबैक: कैसे शुरू हुई थी यह विनाशकारी जंग?

इस पूरे संघर्ष की टाइमलाइन को समझना भी बेहद जरूरी है:

 

  • 28 फरवरी 2026: यह विवाद तब अचानक भड़क उठा, जब अमेरिका और इजराइल ने एक जॉइंट ऑपरेशन के तहत ईरान के सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए।
  • ईरान का पलटवार: इस हमले से बौखलाए ईरान ने भी चुप नहीं बैठने का फैसला किया। ईरान ने भारी तादाद में मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए इजराइल के शहरों और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए।
  • अप्रैल 2026 (सीजफायर): लगभग एक महीने तक चले इस खूनी खेल के बाद, अंतरराष्ट्रीय दबाव और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए अप्रैल की शुरुआत में दोनों देश एक अस्थायी युद्धविराम (Ceasefire) के लिए राजी हुए।
  • मई 2026: तब से लेकर अब तक, पर्दे के पीछे कई देशों (खासकर कतर और ओमान) की मध्यस्थता से शांति समझौते की बातचीत चल रही थी, जो अब अपने मुकाम तक पहुंचती दिख रही है।

 

डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अगर यह समझौता बिना किसी बाधा के लागू हो जाता है, तो यह न केवल मिडिल ईस्ट को एक विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध से बचा लेगा, बल्कि पूरी दुनिया की चरमराती अर्थव्यवस्था को भी फिर से पटरी पर ले आएगा। अब देखना यह है कि क्या अमेरिका और ईरान अपने दशकों पुराने अविश्वास को भुलाकर वास्तव में शांति के इस नए अध्याय की शुरुआत कर पाते हैं या नहीं।
विज्ञापन
dhss