लखनऊ (Lucknow News): यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लाए गए नए नियमों (UGC New Rules 2026) के खिलाफ गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। मंगलवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में विरोध की आग भड़क उठी। श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना (Karni Sena) के कार्यकर्ताओं ने हजरतगंज स्थित परिवर्तन चौक पर अर्धनग्न होकर जोरदार प्रदर्शन किया। वहीं, लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) के छात्र भी सड़कों पर उतर आए और 'UGC Rollback' के नारे लगाए।READ ALSO:-मेरठ में भ्रष्टाचार पर 'सर्जिकल स्ट्राइक': सिंचाई विभाग के जेई के पाप का घड़ा फूटा, 2 लाख की रिश्वत लेते ही विजिलेंस ने कसा शिकंजा; कार बनी थी 'चलती-फिरती बैंक'
प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि नए नियम एकतरफा हैं और जनरल कैटेगरी (General Category) के छात्रों को निशाना बनाने के लिए लाए गए हैं। करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अर्धनग्न होकर सरकार को संदेश दिया कि "सरकार की नीतियों ने सवर्ण समाज को नंगा कर दिया है।"
परिवर्तन चौक पर हाई-वोल्टेज ड्रामा: 'UCC लाओ, UGC हटाओ'
मंगलवार शाम होते-होते लखनऊ का परिवर्तन चौक छावनी में तब्दील हो गया। करणी सेना के सैकड़ों कार्यकर्ता पहले से तय कार्यक्रम के तहत वहां जमा हुए। देखते ही देखते कार्यकर्ताओं ने अपने शर्ट और कुर्ते उतार दिए और अर्धनग्न अवस्था में प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनके हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था— "UCC लाओ, UGC हटाओ"।

जोश से लबरेज ये कार्यकर्ता विधान भवन (Vidhan Sabha) का घेराव करने के लिए आगे बढ़े, लेकिन पुलिस ने पहले से ही भारी बैरिकेडिंग कर रखी थी। पुलिस द्वारा रोके जाने पर कार्यकर्ता बैरिकेडिंग पर चढ़ गए और UGC व सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
करणी सेना के एक पदाधिकारी ने कहा, "यह नियम तुष्टीकरण की राजनीति है। जब तक UGC अपने ये काले नियम वापस नहीं लेता, हम ऐसे ही बिना कपड़ों के प्रदर्शन करेंगे, क्योंकि सरकार ने हमें सामाजिक और मानसिक रूप से नंगा कर दिया है।"
लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्रों का हुजूम, पुलिस से नोकझोंक
शहर के दूसरे हिस्से में, लखनऊ विश्वविद्यालय (LU) के गेट नंबर-1 पर माहौल तनावपूर्ण रहा। बड़ी संख्या में छात्र कैंपस से बाहर निकले और सड़क जाम करने की कोशिश की। भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बीच छात्रों ने गेट नंबर-1 से गेट नंबर-3 तक मार्च निकाला।
छात्रों का कहना है कि वे किसी विशेष जाति के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन UGC New Rules 2026 की आड़ में सामान्य वर्ग के छात्रों के उत्पीड़न की साजिश रची जा रही है।
छात्रों की क्या हैं दलीलें?
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अर्पित तिवारी (छात्र नेता): "यूजीसी के नए दिशा-निर्देशों के जरिए जनरल कैटेगरी के छात्रों को सीधे तौर पर 'अपराधी' घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह समानता नहीं, बल्कि नया भेदभाव है।"
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शशांक जायसवाल: "यह कानून कैंपस में हमारी दोस्ती तोड़ने के लिए लाया गया है। आज यूजीसी के खिलाफ केवल सवर्ण नहीं, बल्कि हर जाति और वर्ग का समझदार छात्र प्रदर्शन करने उतरा है।"
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आशुतोष त्रिपाठी: "हम सभी लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र इसका विरोध करते हैं। जिस तरह एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) का दुरुपयोग होता है, उसी तरह इन नियमों का इस्तेमाल भी व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए किया जाएगा।"
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आकर्ष मिश्रा: "यूजीसी सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए ये नियम लाई है। इससे कॉलेज कैंपस में जातीय संघर्ष (Caste Conflict) बढ़ेगा।"
आखिर क्या हैं UGC New Rules 2026?
विरोध की जड़ को समझने के लिए हमें इन नियमों को समझना होगा। 13 जनवरी 2026 को UGC ने 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन, 2026' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को नोटिफाई किया था।
नए नियमों के मुख्य प्रावधान:
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जीरो टॉलरेंस: कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज को जाति आधारित भेदभाव के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी।
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शिकायत निवारण: हर संस्थान में 'इक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेल' (Equal Opportunity Cell - EOC) का गठन होगा।
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हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग: SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाई जाएंगी।
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सख्त कार्रवाई: यदि कोई कॉलेज भेदभाव रोकने में विफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है और ग्रांट रोकी जा सकती है।
सरकार और UGC का तर्क है कि ये बदलाव रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने और उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं।
विरोध के 4 बड़े कारण: सवर्ण छात्र क्यों डरे हुए हैं?
प्रदर्शनकारी छात्रों और बुद्धिजीवियों ने UGC New Rules 2026 में चार प्रमुख खामियां गिनाई हैं, जो इस विरोध का आधार हैं:
1. भेदभाव की परिभाषा और 'स्वाभाविक अपराधी' का ठप्पा
नए नियमों में 'भेदभाव' (Discrimination) की परिभाषा में पीड़ित के रूप में केवल SC, ST, OBC, महिलाओं और विकलांगों को शामिल किया गया है। इसमें जनरल कैटेगरी (General Category) या सवर्ण छात्रों को 'पीड़ित' के दायरे से बाहर रखा गया है।
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आरोप: छात्रों का कहना है कि नियमों के मुताबिक, एक सवर्ण छात्र भेदभाव का 'आरोपी' तो हो सकता है, लेकिन वह कभी 'पीड़ित' नहीं माना जाएगा।
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सोशल मीडिया रिएक्शन: एक यूजर ने लिखा, "इन नियमों में सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि पीड़ित और आरोपी की जाति पहले से तय कर दी गई है। पीड़ित हमेशा आरक्षित वर्ग से होगा और अपराधी हमेशा जनरल कास्ट का।"
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विशेषज्ञ राय: आरटीआई एक्टिविस्ट प्रोफेसर नेहा दास के मुताबिक, "ये गाइडलाइंस जन्म के आधार पर ही उत्पीड़क या उत्पीड़ित का ठप्पा लगाती हैं। इससे कैंपस में टकराव बढ़ेगा।"
2. झूठी शिकायत पर कोई सजा नहीं (No Penalty for False Complaints)
सबसे बड़ा डर झूठी शिकायतों का है। ड्राफ्ट रेगुलेशन में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंड का प्रावधान था, लेकिन 13 जनवरी को लागू हुए फाइनल नोटिफिकेशन में इसे हटा दिया गया है।
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जोखिम: अब अगर कोई छात्र रंजिश के तहत किसी प्रोफेसर या साथी छात्र पर जातिगत भेदभाव का झूठा आरोप लगाता है, तो शिकायत झूठी साबित होने पर भी शिकायतकर्ता पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इससे ब्लैकमेलिंग और झूठे मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।
3. इक्विटी कमेटी में एकतरफा प्रतिनिधित्व
नियमों के अनुसार, कॉलेजों में बनने वाली 'इक्विटी कमेटी' (Equity Committee) और EOC में SC/ST/OBC, महिलाओं और विकलांग श्रेणियों के सदस्य होंगे।
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समस्या: इसमें जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। छात्रों का तर्क है कि जब फैसला करने वाली कमेटी में उनका कोई प्रतिनिधि ही नहीं होगा, तो निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह कमेटी एक तरफा तरीके से काम करेगी।
4. कॉलेज प्रशासन पर दबाव और मेरिट की अनदेखी
नियमों के तहत, भेदभाव की शिकायत सही पाए जाने या नियमों का उल्लंघन होने पर UGC कॉलेज की ग्रांट रोक सकता है या मान्यता रद्द कर सकता है।
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प्रभाव: आलोचकों का कहना है कि इतनी सख्त सजा के डर से कॉलेज प्रशासन दबाव में रहेगा। अपनी मान्यता बचाने के लिए वे बिना पूरी जांच के ही आरोपी (सवर्ण छात्र/फैकल्टी) के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। इससे मेरिट के आधार पर निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित होगी।
UGC एक्ट 1956 का उल्लंघन?
कानूनी जानकारों का एक वर्ग यह भी तर्क दे रहा है कि ये नियम 1956 के UGC एक्ट के दायरे से बाहर हैं। UGC ने ये नियम एक्ट के आर्टिकल 26 के तहत बनाए हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि UGC एक्ट का मूल उद्देश्य अकादमिक मानकों (Academic Standards) और अनुदान (Grants) को विनियमित करना है, न कि सामाजिक या जातीय भेदभाव के पुलिसिंग (Policing) करना। एक्ट में सीधे तौर पर जातिगत भेदभाव रोकने के दंडात्मक नियमों का कोई जिक्र नहीं है, हालांकि आर्टिकल 26(1) UGC को मानकों से जुड़े नियम बनाने की शक्ति देता है।
नियमों की पृष्ठभूमि: रोहित वेमुला से लेकर नई गाइडलाइंस तक
यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ है। इसके पीछे एक लंबा संघर्ष और अदालती प्रक्रिया रही है:
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2012: UGC ने पहली बार भेदभाव रोकने के लिए नियम बनाए थे, लेकिन वे केवल सुझाव मात्र थे।
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2016 & 2019: हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला और मुंबई में डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या ने देश को झकझोर दिया। इन घटनाओं के बाद नियमों को सख्त करने की मांग उठी।
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सुप्रीम कोर्ट का दखल: 2019 में पीड़ितों के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने UGC को सख्त कदम उठाने और डेटा इकट्ठा करने का निर्देश दिया।
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ड्राफ्ट और बदलाव: फरवरी 2025 में ड्राफ्ट आया, जिसका ओबीसी संगठनों ने विरोध किया क्योंकि उसमें OBC शामिल नहीं थे। बाद में संसदीय समिति (जिसके अध्यक्ष दिग्विजय सिंह थे) की सिफारिशों के बाद फाइनल नियमों में OBC को शामिल किया गया और 'झूठी शिकायत पर दंड' का प्रावधान हटा दिया गया।
शिकायत निवारण की प्रक्रिया: 24 घंटे में एक्शन
नए नियमों (UGC New Rules 2026) के तहत शिकायत निवारण की प्रक्रिया को बेहद तेज बनाया गया है:
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इक्वलिटी कमेटी: कॉलेज के प्रिंसिपल/प्रमुख इसके अध्यक्ष होंगे।
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इक्विटी स्क्वाड: यह एक निगरानी दस्ता होगा जो कैंपस में घूमकर माहौल पर नजर रखेगा।
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समय सीमा: भेदभाव की शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर इक्वलिटी कमेटी को बैठक करनी होगी।
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रिपोर्ट: 15 दिनों के अंदर रिपोर्ट कॉलेज प्रमुख को सौंपनी होगी और अगले 7 दिनों में कार्रवाई शुरू करनी होगी।
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बाहरी मदद: कॉलेज प्रशासन को लीगल अथॉरिटीज, पुलिस और एनजीओ के साथ मिलकर काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
विश्लेषण: समानता की राह या नया विभाजन?
गरुण प्रकाशन के फाउंडर और सीईओ संक्रांत सानू का मानना है, "ये नियम अकादमिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं। इससे शिक्षण संस्थानों में कास्ट पॉलिटिक्स (Caste Politics) को बढ़ावा मिलेगा और पढ़ाई का माहौल खराब होगा।"
दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों को कैंपस में जिस तरह के मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, उसे रोकने के लिए 'सख्त' नियमों की ही जरूरत थी। IIT की 2025 की एक स्टडी बताती है कि आरक्षित वर्ग के 75% छात्र कभी न कभी भेदभाव महसूस करते हैं।
लेकिन, जिस तरह से 'झूठी शिकायत' के प्रावधान को हटाया गया है और 'पीड़ित' की परिभाषा को सीमित किया गया है, उसने एक बड़े वर्ग (जनरल कैटेगरी) को असुरक्षित महसूस करा दिया है। लखनऊ में करणी सेना और छात्रों का यह प्रदर्शन इसी असुरक्षा की अभिव्यक्ति है।
UGC New Rules 2026 का उद्देश्य यकीनन पवित्र हो सकता है—कैंपस को भेदभाव मुक्त बनाना। लेकिन लखनऊ में हुए जोरदार प्रदर्शन और छात्रों के तर्कों ने यह साबित कर दिया है कि इन नियमों के मौजूदा स्वरूप में कुछ गंभीर खामियां हैं, जिन पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।
करणी सेना का अर्धनग्न प्रदर्शन और छात्रों का आक्रोश सरकार के लिए खतरे की घंटी है। यदि जनरल कैटेगरी के छात्रों की आशंकाओं—विशेषकर झूठी शिकायतों और एकतरफा कार्रवाई—को दूर नहीं किया गया, तो यह आंदोलन देशव्यापी रूप ले सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार और UGC छात्रों के इस विरोध के बाद वार्ता का रास्ता अपनाते हैं या अपने रुख पर कायम रहते हैं।
लखनऊ में UGC के नए नियमों (UGC New Rules 2026) के खिलाफ करणी सेना और विश्वविद्यालय के छात्रों ने उग्र प्रदर्शन किया। करणी सेना ने अर्धनग्न होकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की, वहीं छात्रों ने इन नियमों को जनरल कैटेगरी के खिलाफ साजिश बताया। विरोध का मुख्य कारण नियमों में सवर्णों को पीड़ित की श्रेणी से बाहर रखना और झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान न होना है। UGC ने ये नियम कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किए हैं, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इससे सामाजिक वैमनस्य बढ़ेगा।