क्राइम डेस्क / मेरठ (Meerut News): उत्तर प्रदेश पुलिस का स्लोगन 'आपकी सुरक्षा, हमारा संकल्प' उस वक्त खोखला साबित हो गया, जब मेरठ जिले में पुलिस की वर्दी पहने रक्षकों ने ही भक्षक का रूप ले लिया। मेरठ के गंगानगर थाना क्षेत्र में पुलिस की गुंडागर्दी और ज्यादती का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।READ ALSO:-मेरठ में रूह कंपाने वाली वारदात: कलयुगी पिता ने सौतेली मां के साथ मिलकर 17 साल की बेटी को उतारा मौत के घाट, गुपचुप कर दिया अंतिम संस्कार
गंगानगर थाने में तैनात दो सिपाहियों पर आरोप है कि उन्होंने एक कॉलेज जाने वाले छात्र को महज़ इसलिए बेरहमी से पीट दिया क्योंकि उसने सिपाहियों को 'शराब की पार्टी' देने से इनकार कर दिया था। सिपाहियों की दरिंदगी का आलम यह था कि बेतहाशा पिटाई के कारण पीड़ित छात्र के कान का पर्दा ही फट गया। इस खौफनाक घटना के बाद जब स्थानीय पुलिस ने अपने ही साथियों को बचाने की कोशिश की, तो किसानों के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को कड़ा एक्शन लेना पड़ा।
क्या है पूरा मामला? (The Background of the Incident)
यह पूरी शर्मनाक घटना मेरठ के प्रतिष्ठित IIMT विश्वविद्यालय (IIMT University) में पढ़ने वाले एक छात्र से जुड़ी है। मूल रूप से बुलंदशहर जिले के कस्बा जहांगीराबाद का रहने वाला अभिषेक मेरठ में रहकर पढ़ाई कर रहा है। अभिषेक IIMT विश्वविद्यालय में BCA (बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन) प्रथम वर्ष का छात्र है और वह गंगानगर इलाके में अपने दोस्तों के साथ किराए का मकान लेकर रहता है।

कुछ दिन पहले अभिषेक का विश्वविद्यालय में ही पढ़ने वाले तीन अन्य लड़कों के साथ किसी बात को लेकर विवाद हो गया था और उन लड़कों ने अभिषेक के साथ मारपीट की थी। एक जिम्मेदार नागरिक की तरह, अभिषेक ने कानून अपने हाथ में लेने के बजाय पुलिस कंट्रोल रूम को इसकी सूचना दी। शिकायत मिलने पर गंगानगर थाने की पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीनों आरोपी छात्रों को पकड़ लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई। यहां तक सब कुछ सामान्य था, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह पुलिसिया भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा थी।
पैसे और 'शराब पार्टी' की डिमांड (The Extortion)
पीड़ित छात्र अभिषेक के अनुसार, थाने में तैनात सिपाही अमित यादव और तेजबहादुर (कुछ जगह शिवबहादुर नाम का भी जिक्र) ने इस मामले में कार्रवाई करने और समझौता कराने के एवज में उससे पैसों की मांग शुरू कर दी।
आरोप है कि इन दोनों सिपाहियों ने अभिषेक से सीधे तौर पर 2,000 रुपये की रिश्वत मांगी। डरे-सहमे छात्र ने किसी तरह अपनी जेब खर्च से 1,000 रुपये सिपाहियों को दे दिए। लेकिन खाकी वर्दी का लालच यहीं नहीं रुका। 1,000 रुपये लेने के बाद सिपाहियों ने अभिषेक पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह उन्हें 'शराब की पार्टी' दे। जब एक छात्र होने के नाते अभिषेक ने शराब की पार्टी देने और अधिक पैसे खर्च करने में असमर्थता जताई और साफ इनकार कर दिया, तो सिपाही आगबबूला हो गए।
16 मई की वह खौफनाक घटना (The Brutal Assault)
यह खौफनाक वारदात 16 मई की है। अभिषेक अपने कुछ दोस्तों के साथ गंगानगर इलाके में घूम रहा था। तभी सादे कपड़ों में सिपाही अमित यादव वहां पहुंच गया और अभिषेक का पीछा करने लगा। पुलिस वाले को सादे कपड़ों में अपने पीछे पड़ा देख अभिषेक घबरा गया और अपनी जान बचाने के लिए वह भागकर गंगानगर थाने के अंदर ही घुस गया। उसे लगा था कि थाने के अंदर वह सुरक्षित रहेगा।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि जिस थाने को वह अपनी सुरक्षा का मंदिर समझ रहा है, वहीं उसके साथ सबसे बड़ी ज्यादती होने वाली है। आरोप है कि थाने के अंदर सिपाही ने अभिषेक को पकड़ लिया और बिना किसी वजह के उसे जानवरों की तरह पीटना शुरू कर दिया। अभिषेक को इतने अनगिनत और जोरदार थप्पड़ मारे गए कि उसके कान का पर्दा फट गया और उसे गंभीर चोटें आईं।
कार्रवाई के नाम पर लीपापोती और फिर फूटा किसानों का गुस्सा
16 मई की इस घटना के बाद पीड़ित छात्र अभिषेक ने अपने परिजनों को पूरी बात बताई। परिजनों ने तुरंत पुलिस के उच्चाधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन 'चोर-चोर मौसेरे भाई' की तर्ज पर स्थानीय पुलिस अपने दागी सिपाहियों को बचाने में जुट गई और कई दिनों तक कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।
जब न्याय के सारे रास्ते बंद होते दिखे, तब मामला भारतीय किसान यूनियन (BKU) तक पहुंचा। दरअसल, पीड़ित छात्र अभिषेक भाकियू (टिकैत गुट) के प्रदेश महासचिव गुड्डू प्रधान का सगा भतीजा है। जब किसान नेताओं को पता चला कि पुलिस ने उनके बच्चे के साथ इतनी बड़ी दरिंदगी की है और अब मुकदमा तक दर्ज नहीं कर रही है, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
थाने में जले चूल्हे, 5.5 घंटे तक चला हाई-वोल्टेज ड्रामा (The Protest)
मंगलवार, 26 मई की सुबह भारी संख्या में भाकियू टिकैत की टीम और सैकड़ों किसान गंगानगर थाने पहुंच गए। जब पुलिस ने उनकी सुनवाई नहीं की, तो किसानों ने थाने के परिसर में ही अपना अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।
किसानों का विरोध इतना उग्र और सुसंगठित था कि उन्होंने थाने के अंदर ही ईंटों के चूल्हे सुलगा दिए और वहीं अपना खाना पकाने का इंतजाम कर लिया। इस अभूतपूर्व घेराव को देखकर पुलिस महकमे के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में मवाना सर्किल के सीओ (CO) पंकज लवानिया मौके पर पहुंचे और किसानों को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन किसान दोनों सिपाहियों की बर्ख़ास्तगी और एफआईआर की मांग पर अड़े रहे।
पूरे साढ़े पांच घंटे के लंबे हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद एसपी क्राइम (SP Crime) मौके पर पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवार और किसान नेताओं की पूरी बात विस्तार से सुनी और कड़ी कार्रवाई का लिखित आश्वासन दिया, तब जाकर किसानों ने अपना धरना समाप्त किया।
एसएसपी का एक्शन और फरार सिपाही (Action and Investigation)
मामले की गंभीरता और थाने के घेराव की सूचना जब जिले के आला कप्तान, एसएसपी (SSP) अविनाश पांडेय तक पहुंची, तो उन्होंने बिना कोई समय गंवाए कड़ा रुख अख्तियार किया। एसएसपी ने प्रारंभिक जांच के आधार पर दोनों आरोपी सिपाहियों (अमित यादव और तेजबहादुर) को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया है। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण की एक उच्च स्तरीय विभागीय जांच भी बैठा दी गई है।
दूसरी तरफ, पीड़ित छात्र अभिषेक के परिजनों की तरफ से दोनों आरोपी सिपाहियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने में लिखित तहरीर दे दी गई है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जैसे ही मंगलवार सुबह किसानों का धरना शुरू हुआ, आरोपी बनाए गए दोनों सिपाही थाने से रफूचक्कर हो गए। पुलिस के ही आला अधिकारियों को अपने ही महकमे के इन दागी सिपाहियों की कोई लोकेशन नहीं मिल रही है।
परिजनों का सवाल: पुलिस के लिए अलग कानून क्यों?
इस पूरी घटना ने पुलिस प्रणाली के दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है। पीड़ित अभिषेक के परिजनों ने एक बेहद जायज और तीखा सवाल उठाया है।
"जब कोई आम आदमी सड़क पर किसी के साथ थोड़ी सी भी मारपीट करता है या किसी का अंगभंग करता है, तो पुलिस तुरंत उसके खिलाफ हत्या के प्रयास और अन्य तमाम संगीन धाराओं (IPC Sections) में मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज देती है। लेकिन जब यही गुंडागर्दी खुद पुलिस वाले कर रहे हैं, उन्होंने हमारे बच्चे के कान का पर्दा फाड़कर उसे जीवन भर के लिए दिव्यांग बनाने की कोशिश की है, तो उनके खिलाफ तुरंत मुकदमा क्यों नहीं लिखा जा रहा है?"
मेरठ के गंगानगर थाने की यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि आम आदमी न्याय के लिए आखिर किस दरवाजे पर जाए, जब न्याय के रक्षक ही अपराधियों जैसा व्यवहार करने लगें। महज़ कुछ रुपयों और शराब की एक बोतल के लिए एक नौजवान छात्र को पीटना और उसे गंभीर चोटें पहुंचाना पुलिस की वर्दी पर एक बहुत बड़ा कलंक है।
एसएसपी अविनाश पांडेय का सस्पेंशन का आदेश एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन असली न्याय तब मिलेगा जब इन फरार सिपाहियों पर कड़ी धाराओं में एफआईआर दर्ज कर इन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। अब मेरठ की जनता और छात्र संगठन इस बात का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि खाकी वर्दी वालों के खिलाफ यह कानूनी कार्रवाई किस अंजाम तक पहुंचती है।