खबरीलाल टीम
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध (US-Israel vs Iran War) का असर अब केवल अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी तपिश उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर तक पहुंच गई है। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण मेरठ कमर्शियल गैस संकट गहरा गया है। कमर्शियल LPG (तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) सिलेंडर की भारी किल्लत के चलते मेरठ और आसपास के इलाकों में सैकड़ों स्ट्रीट फूड की दुकानें, ढाबे, रेस्टोरेंट और होटल बंद होने की कगार पर आ गए हैं। इस संकट ने न केवल व्यापार को ठप कर दिया है, बल्कि हजारों कामगारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट भी खड़ा कर दिया है।READ ALSO:-खून का बदला फांसी! दिल्ली में तरुण की निर्मम हत्या से बिजनौर में उबला खटीक समाज, कलेक्ट्रेट पर किया जोरदार प्रदर्शन

 

हालत यह है कि जो हाइवे कल तक मुसाफिरों की चहल-पहल और लजीज खाने की खुशबू से गुलजार रहते थे, वहां आज सन्नाटा पसरा है। गैस की कमी ने उन छोटे और मझोले व्यापारियों की कमर तोड़ दी है, जिनका पूरा व्यवसाय एलपीजी पर निर्भर है।

 

NH-58 दिल्ली-देहरादून हाइवे पर पसरा सन्नाटा

मेरठ से गुजरने वाले सबसे व्यस्त राजमार्गों में से एक, NH-58 (दिल्ली-देहरादून हाइवे) पर इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है। इस मार्ग पर कई छोटी-बड़ी दुकानें, रेस्तरां और ढाबे स्थित हैं, जो 24 घंटे यात्रियों के लिए चाय-नाश्ते और भोजन का प्रबंध करते थे। मेरठ कमर्शियल गैस संकट के कारण अब स्थिति यह है कि:

 

  • 90% कारोबार ठप: हाइवे पर स्थित लगभग 90 प्रतिशत भोजन प्रतिष्ठानों ने गैस न होने के कारण अपना काम रोक दिया है।
  • पैकेज्ड फूड का सहारा: अब केवल 10 प्रतिशत व्यापारी ही अपना व्यवसाय किसी तरह चला पा रहे हैं, और वे भी मुख्य रूप से बिस्कुट, चिप्स और अन्य पैकेज्ड उत्पादों की बिक्री तक सीमित हो गए हैं।
  • चाय के लिए तरसते मुसाफिर: मुसाफिरों को अब सफर के दौरान एक कप चाय के लिए भी कई किलोमीटर तक भटकना पड़ रहा है।

 

मेरठ के मोदीपुरम में एक मशहूर होटल के संचालक अर्जुन बताते हैं कि पिछले एक सप्ताह से कमर्शियल गैस सिलेंडर की आपूर्ति पूरी तरह से बंद है। उनका कहना है, "पहले काम बहुत अच्छा चल रहा था। 24 घंटे पर्यटक और यात्री आते-जाते थे। लेकिन अब गैस नहीं होने से चूल्हा ठंडा पड़ा है।" अर्जुन ने यह भी बताया कि उनके होटल में काम करने वाले 6 कर्मचारी, काम न होने के कारण मजबूरी में छुट्टी पर चले गए हैं, जिससे उनके परिवारों पर भी आर्थिक संकट आ गया है।

 

आपदा में अवसर: गैस की कालाबाजारी और आसमान छूती कीमतें

जहां एक तरफ मेरठ कमर्शियल गैस संकट ने आम व्यापारी को बर्बाद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इस 'आपदा में अवसर' तलाशते हुए कालाबाजारी (Black Marketing) में जुट गए हैं। गैस की भारी मांग को देखते हुए मुनाफाखोर सक्रिय हो गए हैं।

 

ढाबा संचालक मोनू का कहना है कि अगर कोई डीलर गैस देने की उम्मीद भी जगाता है, तो वह इसकी एवज में भारी 'प्रीमियम' (अतिरिक्त कीमत) की मांग कर रहा है। मोनू स्पष्ट करते हैं, "अगर हम ब्लैक में महंगे दाम पर कमर्शियल सिलेंडर खरीद भी लें, तो खाने की लागत इतनी बढ़ जाएगी कि हमारा मुनाफा तो दूर, मूल लागत (Average) भी नहीं निकल पाएगी।"

 

स्थानीय निवासी वंश अरोड़ा ने बताया कि कमर्शियल गैस न मिलने का सीधा असर घरेलू गैस की उपलब्धता पर भी पड़ रहा है। लोग मजबूरी में घरेलू गैस सिलेंडरों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसके चलते घरेलू सिलेंडरों के लिए भी अतिरिक्त पैसे वसूले जा रहे हैं।

 

महंगाई की मार: 10 रुपये की चाय अब 25 रुपये में इस मेरठ कमर्शियल गैस संकट का सीधा बोझ आम जनता की जेब पर पड़ रहा है। गैस की किल्लत और ब्लैक मार्केट की उच्च कीमतों के कारण खाद्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़े हैं। हाइवे पर जो साधारण चाय की प्याली पहले 10 रुपये में मिलती थी, अब उसके लिए 25 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

 

कोयले की वापसी और स्ट्रीट फूड वेंडर्स का पलायन

गैस न मिलने पर कई रेस्टोरेंट और ढाबा मालिकों ने पुराने पारंपरिक तरीकों का रुख किया है। कई जगहों पर अब खाना पकाने के लिए फिर से कोयले (Coal) और लकड़ी का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है।

 

मेरठ शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों—जैसे बस अड्डे, रोडवेज स्टैंड, रेलवे स्टेशन और मुख्य बाजारों—में लगने वाली स्ट्रीट फूड मार्केट (Street Food Market) की रौनक भी फीकी पड़ गई है। जो ठेले वाले और रेहड़ी-पटरी वाले कल तक चाउमीन, बर्गर, डोसा और मोमोज़ बेचकर अपना घर चलाते थे, उनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। रेस्टोरेंट संचालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर काम बंद रहा, तो वे दुकानों और होटलों का भारी-भरकम किराया कैसे चुकाएंगे। 

 

प्रशासन सख्त: डीएम ने दिए कार्रवाई के निर्देश

जैसे-जैसे मेरठ कमर्शियल गैस संकट गहरा रहा है और कालाबाजारी की शिकायतें बढ़ रही हैं, जिला प्रशासन भी हरकत में आ गया है। मेरठ के जिलाधिकारी (DM) ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए जिला पूर्ति अधिकारी (District Supply Officer - DSO) को सख्त निर्देश जारी किए हैं:

 

  1. कालाबाजारी पर तत्काल रोक: गैस की जमाखोरी और तय कीमत से अधिक दाम वसूलने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
  2. छापेमारी अभियान: जिले भर में गैस एजेंसियों और संदिग्ध गोदामों की औचक जांच की जाए।
  3. घरेलू गैस के व्यावसायिक उपयोग पर पाबंदी: इस बात की कड़ी निगरानी की जाए कि कमर्शियल गैस की कमी के नाम पर कोई भी व्यवसायी सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग अपने होटल या ढाबे में न करे।

 

जिला पूर्ति अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि विभाग पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है और किसी भी कीमत पर आम उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जाएगा।

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे युद्ध का यह सीधा आर्थिक प्रभाव यह दर्शाता है कि आज की वैश्वीकृत दुनिया में सप्लाई चेन कितनी संवेदनशील है। मेरठ कमर्शियल गैस संकट ने न केवल व्यापारियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, बल्कि आम आदमी का बजट भी बिगाड़ दिया है। प्रशासन हालांकि कालाबाजारी रोकने के लिए सक्रिय है, लेकिन जब तक गैस की सुचारू आपूर्ति बहाल नहीं होती, तब तक मेरठ के हजारों ढाबा और रेस्टोरेंट संचालकों के साथ-साथ वहां काम करने वाले कर्मचारियों की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं। उम्मीद है कि जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और स्थानीय सप्लाई चेन में स्थिरता आएगी, जिससे इन व्यापारियों के चूल्हे एक बार फिर से जल सकेंगे।

 

संक्षिप्त सारांश (Summary) US-इजराइल और ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न वैश्विक सप्लाई चेन की बाधाओं ने यूपी के मेरठ में भारी कमर्शियल गैस संकट पैदा कर दिया है। एलपीजी की कमी के कारण NH-58 और शहर भर में सैकड़ों ढाबे, होटल और स्ट्रीट फूड की दुकानें बंद हो गई हैं, जिससे हजारों लोगों का रोजगार छिन गया है। संकट के बीच गैस की कालाबाजारी भी शुरू हो गई है, जिससे चाय और खाने-पीने की चीजों के दाम दोगुने तक बढ़ गए हैं। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए मेरठ के डीएम ने जिला पूर्ति अधिकारी को कालाबाजारी करने वालों और घरेलू गैस का कमर्शियल इस्तेमाल करने वालों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
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