रिपोर्टर: शकील अहमद (ख़बरीलाल स्पेशल डेस्क), बिजनौर: भारत का ग्रामीण परिवेश हमेशा से अपनी सादगी, आपसी प्रेम और 'गंगा-जमुनी तहजीब' (Ganga-Jamuni Tehzeeb) के लिए पूरी दुनिया में एक मिसाल रहा है। जब बात उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर (Bijnor) की आती है, तो यहाँ की मिट्टी में घुली सूफियाना तासीर और भाईचारा हर त्योहार को एक खास रंग दे देता है। इसी मोहब्बत और कौमी एकता की एक बेहद खूबसूरत और रूहानी मिसाल थाना नूरपुर (Noorpur) क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम गोहावर जैत (Gohawar Jait) में देखने को मिली।READ ALSO:-मौसम का महा-अलर्ट: मार्च में लौटी दिसंबर वाली ठंड! 20 मार्च को यूपी-दिल्ली-बिहार समेत 19 राज्यों में बारिश और तूफान का 'रौद्र रूप', 85kmph की रफ्तार से चलेंगी हवाएं
माहे-रमजान (Month of Ramadan) के इस मुकद्दस (पवित्र) मौके पर गांव में एक भव्य सामूहिक रोजा इफ्तार (Grand Iftar Party) का आयोजन किया गया। यह आयोजन सिर्फ रोजा खोलने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा मंच बन गया जहां से इंसानियत, मुल्क की तरक्की और पूरी दुनिया में शांति (Global Peace) का एक बहुत बड़ा पैगाम दिया गया। स्थानीय समाजसेवी शुऐब (पुत्र तस्लीम अहमद) के पैतृक निवास स्थान पर सजे इस दस्तरख्वान (Dastarkhwan) ने यह साबित कर दिया कि जब समाज के लोग एक साथ बैठते हैं, तो उनके दिलों की दूरियां अपने आप खत्म हो जाती हैं।
ख़बरीलाल (Khabreelal) की इस विशेष और विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट में आइए महसूस करते हैं गोहावर जैत के उस रूहानी माहौल को, जहां सूरज ढलते ही इबादत के लिए उठे हाथों ने पूरी दुनिया के दर्द को अपना दर्द समझकर खुदा की बारगाह में रहम की भीख मांगी।
@Shakeel57767846 यूपी के बिजनौर जिले के नूरपुर स्थित गोहावर जैत गांव में समाजसेवी शुऐब द्वारा सामूहिक रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया। देश में अमन-चैन और विश्व शांति के लिए दुआ मांगी गई। pic.twitter.com/aoSKORYjaQ
— MK Vashisth (@vadhisth) March 19, 2026
गोहावर जैत में सजा भाईचारे का दस्तरख्वान
रमजान का महीना इस्लामी कैलेंडर का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। यह महीना सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने नफ्स (इच्छाओं) पर काबू पाने, गरीबों का दर्द समझने और समाज में बराबरी का संदेश देने का महीना है। गोहावर जैत गांव में आयोजित यह सामूहिक इफ्तार इसी फलसफे (Philosophy) की एक जीती-जागती तस्वीर थी।
मेजबान की दरियादिली: समाजसेवी शुऐब की पहल
इस शानदार और रूहानी महफिल की मेजबानी का जिम्मा गांव के ही युवा और कर्मठ समाजसेवी शुऐब (पुत्र तस्लीम) ने उठाया था। शुऐब क्षेत्र में अपने सामाजिक कार्यों और मिलनसार स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने पैतृक आवास के विशाल प्रांगण में इस इफ्तार का आयोजन किया था।
कार्यक्रम की तैयारियां सुबह से ही शुरू हो गई थीं। गांव के युवाओं ने मिलकर साफ-सफाई से लेकर दस्तरख्वान बिछाने और इफ्तार का सामान सजाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस इफ्तार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, सभी एक ही दस्तरख्वान पर कंधे से कंधा मिलाकर बैठे थे। यही इस्लाम की मूल शिक्षा है और यही भारत की असली ताकत है।
इफ्तार का रूहानी मंजर
जैसे-जैसे सूरज पश्चिम की ओर ढलने लगा और मगरिब (Maghrib) का वक्त करीब आया, शुऐब के घर का आंगन रोजेदारों से खचाखच भर गया। खजूर, तरह-तरह के ताजे फल, शर्बत, पकोड़े और अन्य लजीज व्यंजनों से दस्तरख्वान सजा हुआ था। लेकिन हर किसी की निगाहें आसमान और कानों में अजान की आवाज सुनने की बेताबी थी।
पूरे दिन की प्यास और भूख के बावजूद किसी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि इबादत का एक खास नूर (रोशनी) झलक रहा था। जैसे ही मुअज्जिन ने अजान दी, चारों तरफ एक रूहानी सन्नाटा छा गया और सभी मुस्लिम भाइयों ने एक साथ बिस्मिल्लाह पढ़कर खजूर और पानी से अपना रोजा खोला। एक साथ निवाला तोड़ते सैकड़ों लोगों का यह दृश्य गोहावर जैत के इतिहास में आपसी भाईचारे के एक सुनहरे पन्ने के रूप में दर्ज हो गया।
मुल्क की तरक्की और आपसी भाईचारे के लिए खास दुआ
इफ्तार के तुरंत बाद जो नजारा देखने को मिला, वह इस कार्यक्रम की असली रूह था। रोजा खोलने के बाद सभी ने सामूहिक रूप से हाथ उठाकर अल्लाह की बारगाह में दुआएं मांगी। यह दुआ सिर्फ अपने या अपने परिवार के लिए नहीं थी, बल्कि यह दुआ पूरे मुल्क (भारत) के लिए थी।
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अमन-चैन की फरियाद: उपस्थित जनसमूह ने अत्यंत भावुक माहौल में देश में अमन, चैन और आपसी सौहार्द की सलामती के लिए प्रार्थना की।
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तरक्की का रास्ता: दुआ में मुल्क की तरक्की, गरीबी के खात्मे और हर नागरिक की खुशहाली के लिए खुदा से मदद मांगी गई।
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नफरतों का खात्मा: आज के दौर में जब समाज में कई बार गलतफहमियों के कारण दूरियां बन जाती हैं, गोहावर जैत के इस आंगन से यह दुआ मांगी गई कि लोगों के दिलों से नफरत खत्म हो और मुहब्बत का पैगाम आम हो। भारत की 'अनेकता में एकता' की जो पहचान है, वह हमेशा बरकरार रहे।
वहां मौजूद हर एक शख्स की आंखें नम थीं और हर जुबान से एक ही आवाज निकल रही थी— "आमीन"।
"पूरी इंसानियत को महफूज रख" - विश्व शांति (Global Peace) और युद्ध विराम की पुकार
इस सामूहिक इफ्तार की सबसे अहम और झकझोर देने वाली बात वह दुआ थी, जो दुनिया के अन्य हिस्सों में चल रहे युद्धों (Global Conflicts) को लेकर मांगी गई। अक्सर गांवों के कार्यक्रमों में स्थानीय बातें होती हैं, लेकिन गोहावर जैत के इन ग्रामीणों ने अपनी सोच का दायरा पूरी दुनिया तक फैला दिया।
दुनिया भर के मजलूमों का दर्द
वर्तमान में दुनिया के कई हिस्सों (जैसे मध्य पूर्व, यूरोप के कुछ हिस्से आदि) में युद्ध और अशांति का माहौल है। बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं, बच्चे अनाथ हो रहे हैं और मानवता लहूलुहान है। गोहावर जैत के रोजेदारों ने इस वैश्विक त्रासदी पर गहरी चिंता व्यक्त की।
रोजेदारों ने खुदा के सामने गिड़गिड़ाकर यह दुआ मांगी:
"ऐ अल्लाह! दुनिया के जिस भी कोने में इंसानियत लहूलुहान हो रही है, वहां शांति कायम कर दे। मजलूमों (पीड़ितों) की हिफाजत फरमा। जो लोग बेघर हो गए हैं, उन्हें पनाह दे। दुनिया के हुक्मरानों के दिलों में रहम डाल दे ताकि युद्ध हमेशा के लिए रुक जाएं और चारों तरफ सिर्फ अमन का राज हो।"
यह दुआ इस बात का सुबूत है कि एक सच्चा इंसान हमेशा पूरी इंसानियत के लिए सोचता है, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो। बिजनौर के एक छोटे से गांव से उठी यह विश्व शांति की पुकार आज के तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में एक बेहद सकारात्मक और सुकून देने वाला संदेश है।
समाज को क्या पैगाम देना चाहते हैं आयोजक?
ख़बरीलाल (Khabreelal) के रिपोर्टर शकील अहमद ने जब इस कार्यक्रम के आयोजक और मेजबान समाजसेवी शुऐब से बात की, तो उन्होंने बेहद सादगी के साथ इस पूरे आयोजन का मकसद बयान किया।
शुऐब का संदेश: "रमजान हमें सिर्फ भूखा रहना नहीं सिखाता, यह हमें दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाता है। आज के इस भागदौड़ भरे और मशीनी दौर में लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य समाज को फिर से एक धागे में पिरोना, एकजुटता का संदेश देना और पूरी मानवता की भलाई के लिए प्रार्थना करना है। जब हम एक ही दस्तरख्वान पर बैठकर खाते हैं, तो हमारे दिलों के गिले-शिकवे अपने आप धुल जाते हैं। हमारी दुआ यही है कि हमारे गांव, हमारे बिजनौर, हमारे मुल्क और पूरी दुनिया में सिर्फ और सिर्फ प्यार कायम रहे।"
शुऐब के पिता तस्लीम अहमद ने भी इस मौके पर युवाओं को समाज सेवा और भाईचारे के रास्ते पर चलने की तालीम (शिक्षा) दी। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों ने जिस मुहब्बत के साथ इस गांव को सींचा है, आज की नई नस्ल को भी उसी रिवायत (परंपरा) को आगे बढ़ाना चाहिए।
कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने वाले क्षेत्र के प्रमुख चेहरे
कोई भी सामाजिक कार्यक्रम तब तक सफल नहीं होता, जब तक उसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी न हो। गोहावर जैत के इस इफ्तार में नूरपुर और आसपास के क्षेत्रों के कई गणमान्य व्यक्तियों, बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों ने शिरकत कर इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
प्रमुख उपस्थित जन (Key Attendees):
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डॉ0 शकील अहमद सिद्दीकी: क्षेत्र के जाने-माने चिकित्सक, जो हमेशा समाज सेवा में अग्रणी रहते हैं।
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तस्लीम अहमद: (आयोजक शुऐब के पिता), जिन्होंने अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया।
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सलीम मलिक (समाजसेवी): शिक्षा और सामाजिक सौहार्द के लिए काम करने वाले प्रमुख चेहरे।
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निजाम अंसारी: गांव के वरिष्ठ और सम्मानित व्यक्ति।
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भूरे मालिक: स्थानीय नागरिक, जिन्होंने व्यवस्थाओं में अहम योगदान दिया।
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इशरत अली: जिन्होंने रोजेदारों के लिए इफ्तार की तैयारियों में सहयोग किया।
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मुस्तकीम अंसारी: क्षेत्र के संभ्रांत व्यक्ति।
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वाजिद सिद्दीकी: युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले स्थानीय निवासी।
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मोनी सिद्दीकी: और इनके साथ-साथ गांव के सैकड़ों नौजवान, बुजुर्ग और बच्चे इस पाक महफिल का हिस्सा बने।
इन सभी लोगों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि जब नियत नेक हो और मकसद समाज को जोड़ना हो, तो लोग खुद-ब-खुद कारवां बनकर जुड़ते चले जाते हैं।
बिजनौर की विरासत और रमजान का असल पैगाम (Khabreelal Analysis)
बिजनौर (Bijnor) का इतिहास हमेशा से साहित्यिक, सांस्कृतिक और कौमी एकता का रहा है। यहां ईद, दीवाली, होली और मुहर्रम एक साथ मिलकर मनाए जाते हैं। नूरपुर के गोहावर जैत में हुआ यह आयोजन उसी पुरानी विरासत का एक नया और चमकता हुआ अध्याय है।
रमजान के महीने में 'सदका' (दान), 'जकात' (संपत्ति का एक हिस्सा गरीबों में बांटना) और 'फितरा' (ईद से पहले दिया जाने वाला दान) जैसी व्यवस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि समाज का कोई भी गरीब व्यक्ति भूखा न सोए और वह भी ईद की खुशियों में शामिल हो सके। सामूहिक इफ्तार इसी सामाजिक न्याय (Social Justice) और समानता (Equality) का व्यावहारिक रूप है।
आज जब सोशल मीडिया पर अक्सर नकारात्मक खबरें और दूरियां बढ़ाने वाली बातें छाई रहती हैं, तब रिपोर्टर शकील अहमद द्वारा भेजी गई बिजनौर की यह खबर एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह खबर बताती है कि असली भारत (Real India) आज भी अपने गांवों में बसता है, जहां लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं और जहां की दुआओं में सरहदों का कोई बंधन नहीं होता।
एक दस्तरख्वान, अनगिनत उम्मीदें
गोहावर जैत के इस आयोजन ने सिर्फ रोजेदारों की भूख नहीं मिटाई, बल्कि उन तमाम दिलों को भी सुकून पहुंचाया है जो समाज में अमन और चैन की तलाश कर रहे हैं। शुऐब और उनके परिवार द्वारा उठाया गया यह कदम हर उस व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है जो समाज के लिए कुछ सकारात्मक करना चाहता है।
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, मुहब्बत और दुआ का एक छोटा सा चिराग उसे चीरने के लिए काफी होता है। गोहावर जैत से उठी दुआओं की यह रोशनी यकीनन कबूलियत के आसमान तक पहुंचेगी और हमारे मुल्क व दुनिया में अमन का पैगाम लाएगी।
(ख़बरीलाल न्यूज़ पोर्टल ग्राउंड जीरो से ऐसी ही सकारात्मक, सच्ची और समाज को जोड़ने वाली खबरें आप तक पहुंचाता रहेगा। देश, दुनिया और बिजनौर जिले की हर अपडेट के लिए हमसे जुड़े रहें।)