खबरीलाल टीम
बिजनौर (क्राइम एंड इन्वेस्टिगेशन डेस्क): उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से एक बेहद दर्दनाक और पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना सामने आई है। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित नगीना थाना क्षेत्र में एक 26 वर्षीय युवक का शव 50 फीट ऊंची पानी की टंकी से संदिग्ध परिस्थितियों में लटकता हुआ पाया गया। यह युवक एक दिन पहले शाम को घर से नमाज पढ़ने के लिए निकला था, लेकिन फिर कभी लौटकर वापस नहीं आया।READ ALSO:-धामपुर में उमड़ा आस्था का महासागर: संकट मोचन श्री सिद्धेश्वर बालाजी धाम में 21वें वार्षिक महोत्सव का भव्य शंखनाद, श्री हनुमत यज्ञ से महका पूरा शहर

 

इस हृदय विदारक घटना ने जहां एक तरफ एक हंसते-खेलते परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया है, वहीं दूसरी तरफ 'पुलिसिंग सिस्टम' (Policing System) की उस पुरानी और अमानवीय '24 घंटे वाली थ्योरी' की भी पोल खोल दी है, जिसके तहत पुलिस गुमशुदा व्यक्ति की तुरंत रिपोर्ट दर्ज करने से कतराती है। अगर पुलिस ने परिजनों की गुहार पर रात में ही सक्रियता दिखाई होती, तो शायद इस 26 साल के युवा की जान बचाई जा सकती थी।

 

इस विस्तृत और गहन ग्राउंड रिपोर्ट (In-depth Ground Report) में हम इस पूरी घटना के घटनाक्रम (Chronology), पुलिस की भूमिका, फायर ब्रिगेड के रेस्क्यू ऑपरेशन, मृतक नवेद की मानसिक और शारीरिक स्थिति, और सुसाइड नोट में छिपे उस दर्द की गहराई से पड़ताल करेंगे, जिसने उसे मौत के मुंह में धकेल दिया।

 

घटना का क्रोनोलॉजिकल घटनाक्रम: सोमवार की वह मनहूस शाम (The Timeline of Tragedy)

इस दुखद कहानी की शुरुआत सोमवार, 30 मार्च की शाम से होती है। नगीना कस्बे के मोहल्ला लाल सराय का रहने वाला 26 वर्षीय नवेद अपने परिवार के साथ रहता था। वह पिछले कुछ समय से बीमार चल रहा था, लेकिन सोमवार की शाम तक सब कुछ सामान्य प्रतीत हो रहा था।

 

नमाज के लिए घर से निकलना

परिजनों के अनुसार, सोमवार शाम करीब 6:30 बजे (मगरिब की नमाज का समय) नवेद घर से मस्जिद जाने की बात कहकर निकला था। यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था, इसलिए घर वालों ने शुरुआत में कोई खास चिंता नहीं की।

 

आखिरी फोन कॉल और अनहोनी की आशंका

नमाज का समय बीत जाने के बाद जब नवेद काफी देर तक घर नहीं लौटा, तो परिवार वालों को चिंता सताने लगी।

 

  • सोमवार शाम को ही परिवार के एक सदस्य की नवेद से फोन पर आखिरी बार बात हुई थी। उस समय उसने कुछ स्पष्ट नहीं बताया था।
  • जब रात गहराने लगी (करीब 10 बजे), तो परिजनों ने दोबारा उसका मोबाइल नंबर मिलाया, लेकिन इस बार नवेद का फोन स्विच ऑफ (Switch Off) आ रहा था।
  • फोन बंद होने के बाद परिवार में बेचैनी बढ़ गई। उन्होंने अपने स्तर पर रिश्तेदारों, दोस्तों और आसपास के इलाकों में नवेद की तलाश शुरू की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। रात के अंधेरे में एक बीमार युवक का अचानक गायब हो जाना किसी बड़ी अनहोनी का इशारा कर रहा था।

 

नगीना थाने में पुलिस का रवैया: "24 घंटे बाद आना" (The Apathetic Police Response)

जब परिवार वाले अपने स्तर पर खोजबीन करके हार गए, तो उन्होंने कानून का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। नवेद के परिजन बदहवास हालत में देर रात नगीना थाने (Nagina Police Station) पहुंचे ताकि उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जा सके और पुलिस की मदद से उसे खोजा जा सके।

 

पुलिस की '24 घंटे' वाली घिसी-पिटी दलील

परिजनों का आरोप है कि जब उन्होंने थाने के मुंशी और ड्यूटी ऑफिसर को पूरी घटना बताई और कहा कि नवेद बीमार है तथा उसका फोन भी बंद जा रहा है, तो पुलिस ने तत्परता दिखाने के बजाय एक रटा-रटाया जवाब दे दिया।

 

  • पुलिस कर्मियों ने परिजनों से कहा कि "किसी बालिग व्यक्ति की गुमशुदगी की रिपोर्ट 24 घंटे बीत जाने के बाद ही लिखी जाती है।"
  • परिजनों को यह कहकर वापस भेज दिया गया कि आप लोग सुबह आना, तब तक खुद तलाश करो, शायद कहीं दोस्तों के पास रुक गया होगा।

 

कानूनी मिथक बनाम इंसानियत की जरूरत

भारतीय दंड संहिता (IPC) या नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ऐसा कोई कड़ा नियम नहीं है कि किसी व्यक्ति (विशेषकर जो मानसिक या शारीरिक रूप से बीमार हो) के लापता होने पर पुलिस 24 घंटे तक कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। '24 घंटे का नियम' अक्सर पुलिस थानों में काम के बोझ से बचने या मामले को टालने का एक 'प्रैक्टिकल टूल' (Practical Tool) बन गया है। इस देरी का खामियाजा नवेद के परिवार को उसकी मौत के रूप में चुकाना पड़ा। अगर रात में ही पुलिस ने उसका मोबाइल नंबर सर्विलांस (Surveillance/Location Tracing) पर लगाया होता, तो शायद उसकी आखिरी लोकेशन पता चल जाती और उसे टंकी पर चढ़ने से पहले रोका जा सकता था।

 

खौफनाक सुबह: 50 फीट ऊंची पानी की टंकी और लटकती लाश (The Horrific Discovery)

पुलिस द्वारा खाली हाथ लौटाए जाने के बाद परिजन पूरी रात सो नहीं सके। मंगलवार की सुबह होते ही उन्होंने फिर से तलाश शुरू की।

 

आईटीआई कॉलेज के पास का खौफनाक मंजर

मंगलवार की सुबह कस्बे में सनसनी फैल गई। नगीना-काला खेड़ी मार्ग (Nagina-Kala Khedi Road) पर स्थित आईटीआई कॉलेज (ITI College) के सामने एक सरकारी पानी की टंकी (Overhead Water Tank) बनी हुई है। इस टंकी की ऊंचाई लगभग 50 फीट है।

 

  • सुबह वहां से गुजरने वाले कुछ राहगीरों और एक युवक ने देखा कि पानी की टंकी के ऊपरी हिस्से (लोहे की सीढ़ियों या रेलिंग के पास) से एक युवक का शव फंदे के सहारे हवा में झूल रहा है।
  • देखते ही देखते वहां भारी भीड़ जमा हो गई। इस बात की सूचना तुरंत पुलिस और नवेद के परिजनों को दी गई।
  • जब परिजन बदहवास हालत में मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने 50 फीट ऊपर लटकते हुए शव को अपने बेटे नवेद के रूप में पहचान लिया। घटनास्थल पर चीख-पुकार मच गई। 24 घंटे बाद रिपोर्ट दर्ज करने की बात कहने वाली पुलिस का 24 घंटे पूरे होने से पहले ही एक लाश से सामना हो गया।

 

4. फायर ब्रिगेड का रेस्क्यू ऑपरेशन: शव उतारने की जद्दोजहद (The Rescue Operation)

सूचना मिलते ही नगीना पुलिस के आला अधिकारी— सीओ (Circle Officer) डॉ. अंजनी कुमार चतुर्वेदी और थाना प्रभारी निरीक्षक (SHO) अवनीत मान— भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए।

 

अत्यधिक ऊंचाई बनी चुनौती

पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती नवेद के शव को सुरक्षित नीचे उतारने की थी। टंकी की ऊंचाई 50 फीट से ज्यादा थी और शव ऐसी जगह पर लटका हुआ था जहां से उसे आसानी से खींचा या उतारा नहीं जा सकता था। साधारण पुलिस कर्मियों के लिए वहां तक पहुंचना और भारी शव को लेकर नीचे आना खतरनाक साबित हो सकता था।

 

फायर ब्रिगेड (Fire Brigade) की एंट्री

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए थाना प्रभारी ने तुरंत फायर ब्रिगेड विभाग को सूचित किया।

 

  • कुछ ही देर में दमकल की गाड़ी और प्रशिक्षित बचावकर्मी (Rescue Team) रस्सियों, सेफ्टी गियर और बड़ी सीढ़ियों के साथ मौके पर पहुंच गए।
  • फायर ब्रिगेड के जवानों ने अपनी जान जोखिम में डालते हुए टंकी की लोहे की सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ाई की।
  • फंदे को सावधानीपूर्वक काटा गया और फिर मजबूत रस्सियों (Ropes) का जाल बनाकर शव को बांधा गया।
  • नीचे खड़े पुलिस कर्मियों और स्थानीय लोगों की मदद से रस्सियों को ढील देते हुए, शव को सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से जमीन पर उतारा गया। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन में घंटों का समय लगा।

 

सुसाइड नोट और मौत का असली कारण: बीमारी और डिप्रेशन (The Suicide Note & Motive)

शव को नीचे उतारने के बाद पुलिस ने जब मृतक नवेद के कपड़ों की तलाशी ली, तो उसकी जेब से एक कागज का टुकड़ा बरामद हुआ। यह नवेद का सुसाइड नोट (Suicide Note) था।

 

सुसाइड नोट में क्या लिखा था?

पुलिस के अनुसार, सुसाइड नोट में नवेद ने अपनी मौत के लिए किसी अन्य व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। उसने लिखा है कि वह अपनी लंबी बीमारी (Chronic Illness) और शारीरिक पीड़ा से बेहद परेशान हो चुका है। अपनी इस बीमारी के कारण वह भारी मानसिक तनाव (Depression) में था, जिसके चलते वह अपनी मर्जी से यह आत्मघाती कदम उठा रहा है। पुलिस ने इस सुसाइड नोट को अहम साक्ष्य (Evidence) मानते हुए तुरंत अपने कब्जे में (Seize) ले लिया है। इसे हैंडराइटिंग मिलान (Handwriting Analysis) के लिए फोरेंसिक लैब भेजा जाएगा।

 

चाचा शरीफउद्दीन का दर्दनाक बयान

नवेद के चाचा शरीफउद्दीन ने मौके पर मीडिया और पुलिस को रोते हुए बताया कि उनका भतीजा काफी समय से अस्वस्थ चल रहा था।

 

"नवेद बीमार था, कमजोरी के कारण कुछ दिन पहले ही उसे डॉक्टर के यहां बोतल (IV Drip/ग्लूकोज) चढ़ी थी। वह सोमवार शाम करीब 6 बजे मगरिब की नमाज पढ़ने के लिए घर से निकला था, लेकिन देर रात तक वापस नहीं लौटा। हमने रात करीब 10 बजे उसे फोन किया तो मोबाइल बंद मिला। जब हम घबराकर पुलिस को सूचना देने थाने गए, तो उन्होंने हमें सुबह आने के लिए बोल दिया। आज सुबह एक युवक ने हमें नवेद का शव पानी की टंकी से लटके होने की सूचना दी। उसने सुसाइड क्यों किया, इसका हमें अंदाजा नहीं था, लेकिन वह अपनी बीमारी से जरूर टूट चुका था।"

 

नवेद का जीवन: दिल्ली के सपने और घर वापसी (Profile of the Victim)

नवेद कोई अपराधी या भटका हुआ युवक नहीं था। वह अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहता था।

 

नवेद के भतीजे सलीम ने उसके जीवन के बारे में अहम जानकारी देते हुए बताया:

"नवेद भाई रोजगार की तलाश में दिल्ली गए हुए थे। वह वहां रहकर लाइट फिटिंग (Electrician) का काम सीख रहे थे ताकि कोई हुनर हाथ में आ सके। लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह काम ठीक से नहीं कर पा रहे थे, इसलिए हाल ही में 14 फरवरी को वह दिल्ली से वापस नगीना अपने घर आ गए थे। घर आने के बाद से ही वह चुपचाप और बीमार रहते थे। उनकी किसी से कोई दुश्मनी या झगड़ा नहीं था। वह एक सीधे-सादे इंसान थे।"

 

बीमारी के कारण काम छोड़ना, वापस घर लौटना और भविष्य की अनिश्चितता ने नवेद को मानसिक रूप से खोखला कर दिया था। यह एक 'क्लिनिकल डिप्रेशन' (Clinical Depression) का स्पष्ट मामला प्रतीत होता है, जहां व्यक्ति को अपनी शारीरिक बीमारी के आगे जीवन में कोई उम्मीद (Hope) नजर नहीं आती।

 

पुलिस का आधिकारिक बयान: आगे की कानूनी कार्रवाई (Official Statement & Legal Procedure)

घटनास्थल का मुआयना करने और सुसाइड नोट बरामद करने के बाद, नगीना सर्किल के सीओ डॉ. अंजनी कुमार चतुर्वेदी ने पूरे मामले पर आधिकारिक बयान जारी किया।

 

सीओ डॉ. अंजनी कुमार का बयान:

"आज सुबह पुलिस को सूचना मिली थी कि आईटीआई कॉलेज के पास बनी पानी की टंकी से एक युवक का शव लटक रहा है। थाना प्रभारी अवनीत मान और फायर ब्रिगेड की मदद से शव को नीचे उतार लिया गया है। मृतक की शिनाख्त मोहल्ला लाल सराय निवासी नवेद के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच (Prima Facie) में यह मामला पूरी तरह से आत्महत्या (Suicide) का प्रतीत हो रहा है। मृतक के पास से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें उसने अपनी इच्छा से यह कदम उठाने और अपनी बीमारी को इसका कारण बताया है। परिवार वालों ने भी उसके बीमार होने और डिप्रेशन में होने की पुष्टि की है। हमने शव का पंचनामा भरकर उसे पोस्टमार्टम (Post-mortem) के लिए बिजनौर जिला अस्पताल भेज दिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत का सही समय और कारण स्पष्ट हो पाएगा, जिसके आधार पर आगे की विधिक कार्रवाई (Legal Action) की जाएगी।"

 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या होगा साफ?

पुलिस के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट इस केस को बंद करने या आगे जांच करने का मुख्य आधार होगी।

 

  1. मौत का कारण (Cause of Death): रिपोर्ट यह पुष्टि करेगी कि मौत हैंगिंग (फंदे से लटकने के कारण दम घुटने) से हुई है या कोई अन्य कारण था। (Asphyxia due to ante-mortem hanging).
  2. मौत का समय (Time of Death): पेट में मौजूद भोजन के पचने की स्थिति (Digestion of food) और रिगर मोर्टिस (Rigor Mortis - शरीर का अकड़ना) से यह पता चलेगा कि नवेद ने नमाज के तुरंत बाद आत्महत्या की थी, या वह रात भर कहीं भटकता रहा था।
  3. बीमारी की पुष्टि: विसरा (Viscera) और आंतरिक अंगों की जांच से यह भी पता चल सकेगा कि नवेद वास्तव में किस गंभीर बीमारी से पीड़ित था, जिसका जिक्र उसने सुसाइड नोट में किया है।

 

समाज और मानसिक स्वास्थ्य: बीमारी से उपजा 'सुसाइडल आइडिएशन' (Psychological Analysis)

नवेद की मौत केवल एक पुलिस केस नहीं है; यह हमारे समाज के लिए एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सबक है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे शारीरिक बीमारी (Physical Illness) धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को दीमक की तरह चाट जाती है।

 

1. क्रॉनिक इलनेस और डिप्रेशन (Chronic Illness & Depression)

जब कोई युवा व्यक्ति (जैसे 26 वर्षीय नवेद) किसी लंबी या दर्दनाक बीमारी से घिर जाता है, तो उसे लगता है कि वह अपने परिवार पर बोझ बन गया है। दिल्ली में काम न कर पाना और 14 फरवरी को वापस लौट आना उसके लिए एक 'विफलता' (Failure) जैसा रहा होगा। शारीरिक कमजोरी (जिसके लिए उसे बोतल/ग्लूकोज चढ़ाना पड़ा) इंसान का मनोबल तोड़ देती है।

 

2. ग्रामीण भारत में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी

हमारे टियर-2 और टियर-3 शहरों (जैसे बिजनौर, नगीना) में आज भी 'डिप्रेशन' (Depression) या मानसिक तनाव को कोई बीमारी नहीं माना जाता। परिवार वाले डॉक्टर के पास शारीरिक कमजोरी का इलाज कराने तो ले जाते हैं, लेकिन कोई मनोवैज्ञानिक (Psychiatrist) या काउंसलर के पास नहीं ले जाता। अगर नवेद के सुन्न पड़े दिमाग की काउंसलिंग की गई होती, तो शायद वह पानी की टंकी पर चढ़ने का दुस्साहस नहीं करता।

 

3. सुसाइड की चेतावनी को पहचानना

अक्सर आत्महत्या करने वाला व्यक्ति जाने-अनजाने में कुछ संकेत देता है। गुमसुम रहना, काम छोड़ देना, मौत की बातें करना— ये सभी 'रेड फ्लैग्स' (Red Flags) होते हैं। नवेद के मामले में उसका चुपचाप घर से निकल जाना और फोन बंद कर लेना इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। समाज को इन संकेतों को गंभीरता से लेना सीखना होगा।

 

पुलिस रिफॉर्म की सख्त आवश्यकता: '24 घंटे का नियम' खत्म हो (The Need for Police Reform)

इस पूरे दर्दनाक एपिसोड में सबसे ज्यादा खटकने वाली बात नगीना पुलिस का वह रवैया है, जिसने '24 घंटे' के नियम का हवाला देकर एक परेशान परिवार को थाने से बैरंग लौटा दिया।

 

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और गृह मंत्रालय (MHA) की कई गाइडलाइंस हैं कि गुमशुदगी के मामलों में (विशेषकर महिलाओं, बच्चों और मानसिक रूप से विक्षिप्त/बीमार व्यक्तियों के मामले में) पुलिस को 'जीरो ऑवर' (Zero Hour) से ही काम शुरू कर देना चाहिए। जब एक परिवार रात के 11-12 बजे थाने पहुंच रहा है और बता रहा है कि उनका बेटा बीमार है और फोन बंद है, तो यह एक इमरजेंसी (Emergency) थी, न कि कोई सामान्य गुमशुदगी। अगर पुलिस ने उस रात केवल मोबाइल की लोकेशन ट्रेस कर ली होती, या इलाके में पीआरवी (PRV 112) की गश्त बढ़ा दी होती, तो पानी की टंकी के आसपास किसी हलचल को पकड़ा जा सकता था। यह घटना यूपी पुलिस के लिए एक सबक होनी चाहिए कि 'कागजी नियमों' से ज्यादा 'इंसानी जान' की कीमत होती है।

 

बिजनौर के नगीना क्षेत्र की यह पानी की टंकी अब हमेशा के लिए एक खौफनाक याद बन गई है। 26 साल का नवेद, जिसकी उम्र अभी सपने देखने और उन्हें पूरा करने की थी, वह अपनी बीमारी और अवसाद के आगे हार गया। दिल्ली में लाइट फिटिंग का काम सीखकर अपने घर को रोशन करने का सपना देखने वाला यह युवा, अपने ही परिवार को जीवन भर के अंधेरे में छोड़ गया।

 

सुसाइड नोट, फायर ब्रिगेड का रेस्क्यू, और पुलिस का पोस्टमार्टम— ये सब अब केवल एक फाइल का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल उस 'सिस्टम' और समाज पर कायम रहेगा जो एक बीमार युवा के डिप्रेशन को नहीं समझ सका, और उस पुलिस व्यवस्था पर जिसने 24 घंटे के बेतुके नियम के पीछे छिपकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। नवेद की मौत चीख-चीख कर कह रही है कि शारीरिक बीमारी के साथ-साथ इंसान के मन का इलाज होना भी उतना ही जरूरी है।
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