खबरीलाल टीम
नई दिल्ली (विशेष टेक डेस्क):
भारत पिछले एक दशक में डिजिटल क्रांति का गवाह रहा है। 4G की सस्ती दरों से लेकर 5G की सुपरफास्ट स्पीड तक, देश ने तकनीक के मामले में लंबी छलांग लगाई है। लेकिन अभी भी भारत का एक बड़ा हिस्सा—जैसे घने जंगल, ऊंचे पहाड़, सीमावर्ती इलाके और द्वीप—इंटरनेट की पहुंच से काफी दूर हैं। इसी 'डिजिटल डिवाइड' (Digital Divide) को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए भारत में अब सैटेलाइट इंटरनेट (Satellite Internet) की एंट्री होने जा रही है।
​लंबे समय से कानूनी और तकनीकी पेचीदगियों में फंसी यह तकनीक अब अपने व्यावसायिक लॉन्च के मुहाने पर खड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही सरकार स्पेक्ट्रम आवंटन और ग्राउंड स्टेशनों (Gateway Infrastructure) की अंतिम प्रक्रिया पूरी कर लेगी, देश के आम उपभोक्ताओं के लिए सीधे आसमान से इंटरनेट बरसने लगेगा। इस रेस में एलन मस्क (Elon Musk) की स्टारलिंक (Starlink), मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो (Reliance Jio) और सुनील भारती मित्तल की एयरटेल वनवेब (Airtel OneWeb) ने कमर कस ली है।
 

आखिर क्या है सैटेलाइट इंटरनेट और यह कैसे करता है काम?

​अगर हम मौजूदा इंटरनेट व्यवस्था की बात करें, तो यह पूरी तरह से जमीन के नीचे बिछी ऑप्टिकल फाइबर केबल (Fibre Optic Cables) और हमारे घरों के आस-पास लगे मोबाइल टावरों पर निर्भर करता है। जहां टावर नहीं, वहां इंटरनेट नहीं।
 
​इसके ठीक उलट, सैटेलाइट इंटरनेट में किसी भी तरह के तार या मोबाइल टावर की जरूरत नहीं होती।
 
  • तकनीक (Low Earth Orbit): इसमें पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit या LEO) में स्थापित छोटे-छोटे उपग्रहों (Satellites) के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है। ये उपग्रह पृथ्वी से मात्र 500 से 1200 किलोमीटर की ऊंचाई पर चक्कर लगाते हैं।
  • सीधा कनेक्शन: इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) सीधे अंतरिक्ष में मौजूद इन सैटेलाइट्स को सिग्नल भेजता है, और वे सैटेलाइट्स उस सिग्नल को वापस आपके घर की छत पर लगे एक छोटे से 'डिश एंटीना' (Receiver/Terminal) तक पहुंचाते हैं।
  • फायदा: यही कारण है कि हिमालय की चोटियों, राजस्थान के रेगिस्तान, लक्षद्वीप जैसे द्वीपों और देश की सीमाओं पर तैनात जवानों तक, जहां केबल बिछाना असंभव है, वहां भी अब हाई-स्पीड इंटरनेट बिना किसी रुकावट के पहुंच सकेगा।

क्यों हुई सेवा शुरू होने में देरी? (स्पेक्ट्रम का महासंग्राम)

​सैटेलाइट इंटरनेट सेवा भारत में बहुत पहले शुरू हो सकती थी, लेकिन इसके लॉन्च में सबसे बड़ा रोड़ा स्पेक्ट्रम आवंटन (Spectrum Allocation) का विवाद था। इस मुद्दे पर दुनिया के दो सबसे बड़े रईसों की कंपनियों के बीच सीधा टकराव देखने को मिला:
 
  1. रिलायंस जियो की मांग (नीलामी): जियो का तर्क था कि जिस तरह 4G और 5G के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी (Auction) होती है, वैसे ही सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की भी नीलामी होनी चाहिए, ताकि सभी कंपनियों को समान अवसर (Level Playing Field) मिले।
  2. स्टारलिंक की मांग (प्रशासनिक आवंटन): वहीं एलन मस्क की स्टारलिंक और अन्य वैश्विक कंपनियों का तर्क था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम एक साझा संसाधन (Shared Resource) है, जिसे काटा या बांटा नहीं जा सकता। इसलिए इसे वैश्विक मानकों के आधार पर सरकारी फीस लेकर 'प्रशासनिक तरीके' (Administrative Route) से आवंटित किया जाना चाहिए।
लंबे विचार-विमर्श के बाद, भारत सरकार ने प्रशासनिक तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। इस फैसले से स्टारलिंक और एयरटेल वनवेब जैसी कंपनियों ने राहत की सांस ली। अब बस लाइसेंसिंग की अंतिम शर्तें तय होते ही यह सेवा ग्राहकों के लिए लाइव कर दी जाएगी।

कीमतों का गणित: सैटेलाइट इंटरनेट के लिए कितना ढीला करना होगा पर्स?

​भारत जैसे 'प्राइस-सेंसिटिव' (कीमत के प्रति संवेदनशील) बाजार में कोई भी तकनीक तभी सफल हो सकती है, जब वह आम आदमी की पहुंच में हो। आइए समझते हैं कि विभिन्न कंपनियां क्या रणनीति अपना रही हैं:

1. रिलायंस जियो (Jio SpaceFiber) - सबसे सस्ता और बजट फ्रेंडली

​रिलायंस जियो हमेशा की तरह बाजार को 'डिसरप्ट' (Disrupt) करने की योजना बना रही है।
 
  • रणनीति: जियो आम उपभोक्ताओं और ग्रामीण भारत को टारगेट कर रही है। कंपनी हर घर में महंगा डिश लगाने के बजाय, एक गांव या मोहल्ले में एक साझा 'सैटेलाइट गेटवे' लगाएगी और वहां से अपने मौजूदा Jio AirFiber नेटवर्क के जरिए घर-घर वाई-फाई (Wi-Fi) पहुंचाएगी।
  • संभावित कीमत: रिपोर्ट्स के मुताबिक, जियो के सैटेलाइट इंटरनेट प्लान 500 रुपये से लेकर 1,000 रुपये प्रतिमाह के बीच हो सकते हैं। हार्डवेयर पर भारी सब्सिडी मिलने की भी उम्मीद है।

2. स्टारलिंक (Starlink) - प्रीमियम और हाई-परफॉरमेंस

​एलन मस्क की कंपनी शुरुआत में प्रीमियम ग्राहकों और दूरदराज के समृद्ध उपभोक्ताओं पर फोकस करेगी।
 
  • उपकरण की लागत: स्टारलिंक का कनेक्शन लेने के लिए ग्राहक को सबसे पहले एक हार्डवेयर किट (डिश एंटीना, राउटर और केबल) खरीदनी होगी, जिसकी कीमत भारत में 30,000 रुपये से 34,000 रुपये के बीच हो सकती है।
  • संभावित कीमत: इसका मासिक अनलिमिटेड डेटा प्लान 3,000 रुपये से 4,200 रुपये के बीच रहने का अनुमान है। हालांकि, बाजार में पकड़ बनाने के लिए मस्क शुरुआत में भारी डिस्काउंट या मुफ्त ट्रायल (Free Trial) ऑफर कर सकते हैं।

3. एयरटेल वनवेब (Airtel OneWeb) - बिजनेस और B2B फोकस

​सुनील भारती मित्तल के समर्थन वाली वनवेब आम घरों में इंटरनेट पहुंचाने की जल्दबाजी में नहीं है।
 
  • रणनीति: कंपनी का पूरा ध्यान 'बिजनेस टू बिजनेस' (B2B) मॉडल पर है। यह भारतीय सेना, रक्षा प्रतिष्ठानों, सरकारी विभागों, एविएशन (हवाई जहाजों में वाई-फाई), मर्चेंट नेवी (जहाजों पर इंटरनेट) और बड़े कॉर्पोरेट संस्थानों को अपनी सैटेलाइट कनेक्टिविटी बेचेगी।

4. अमेज़न का प्रोजेक्ट कुइपर (Amazon Project Kuiper)

​जेफ बेजोस की कंपनी अमेज़न भी इस रेस में पीछे नहीं है। हालांकि, यह कंपनी भारतीय बाजार में थोड़ी देर से यानी साल 2027-28 तक एंट्री करेगी। इसका फोकस भी किफायती हार्डवेयर और प्राइम इकोसिस्टम के साथ तेज इंटरनेट देने पर होगा।
 

आम भारतीय के जीवन पर क्या होगा इसका असर? (बड़े फायदे)

 
शुरुआती दौर में सैटेलाइट इंटरनेट स्थापित करने का खर्च (इंफ्रास्ट्रक्चर कॉस्ट) बहुत अधिक है, इसलिए शुरुआत में इसके प्लान फाइबर ब्रॉडबैंड की तुलना में काफी महंगे होंगे। लेकिन, जैसे-जैसे जियो, स्टारलिंक और अमेज़न के बीच कम्पटीशन (Competition) बढ़ेगा और ग्राहकों की संख्या में इजाफा होगा, वैसे-वैसे डेटा प्लान्स और रिसीवर की कीमतों में भारी गिरावट आना तय है। ठीक वैसे ही, जैसे 2016 में 4G के आने पर हुआ था। भारत एक बार फिर एक नई डिजिटल उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है!
  1. शिक्षा और टेली-मेडिसिन: पहाड़ों या सुदूर गांवों के बच्चे अब बिना बफरिंग के ऑनलाइन क्लास ले सकेंगे। साथ ही बड़े शहरों के डॉक्टर वीडियो कॉल के जरिए गांव के मरीजों का इलाज कर पाएंगे।
  2. प्राकृतिक आपदाओं में संजीवनी: बाढ़, भूकंप या तूफान के समय अक्सर मोबाइल टावर गिर जाते हैं या बिजली कट जाती है। सैटेलाइट इंटरनेट ऐसी आपदाओं के समय भी लगातार काम करता रहेगा, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन में बड़ी मदद मिलेगी।
  3. वर्क फ्रॉम एनीव्हेयर (Work From Anywhere): अब आप पहाड़ों की वादियों में या किसी द्वीप पर बैठकर भी अपने ऑफिस का काम उसी स्पीड से कर पाएंगे, जो आपको दिल्ली या मुंबई के ऑफिस में मिलती है।
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