खबरीलाल टीम
बचपन से ही हम कॉमिक बुक्स और फिल्मों में सुपरहीरोज की कहानियां देखते और पढ़ते आए हैं। वो सुपरहीरो जो आसमान से उड़ते हुए आते हैं, जिनके कंधों पर एक 'केप' (Cape/लबादा) उड़ रहा होता है, और जो पलक झपकते ही लोगों की जान बचा लेते हैं। लेकिन यथार्थ की दुनिया इससे बिल्कुल अलग है। असल जिंदगी में जब कोई भीषण सड़क दुर्घटना होती है, तो वहां कोई आयरन मैन, सुपरमैन या शक्तिमान नहीं आता। वहां मौजूद होते हैं आप और हम जैसे आम नागरिक।READ ALSO:-गाजियाबाद के होटल में खौफनाक वारदात: मुस्लिम युवक के साथ रुकी 23 साल की रश्मि की फंदे से लटकती मिली लाश, बंद कमरे से आती रही आवाज़- 'नदीम को बुला दो'

 

"हर सुपरहीरो के पास केप नहीं होती..." यह पंक्ति इस बात का सबसे सटीक उदाहरण है कि इंसानियत का फर्ज निभाने के लिए किसी जादुई शक्ति की जरूरत नहीं होती। खून से लथपथ, सड़क पर तड़पते किसी अजनबी को देखकर जो इंसान अपना वाहन रोकता है, उसे सहारा देता है और अस्पताल पहुंचाता है, सही मायनों में वही समाज का असली सुपरहीरो है।

 

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का भयावह सच

सड़क सुरक्षा के मामले में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं। इसका मतलब है कि हर दिन औसतन 400 से ज्यादा लोग सड़कों पर काल का ग्रास बन रहे हैं। इनमें से कई मौतें सिर्फ इसलिए हो जाती हैं क्योंकि घायलों को समय पर चिकित्सा सहायता (Medical Help) नहीं मिल पाती।

 

हादसे के बाद सड़क पर पड़े व्यक्ति के पास से सैकड़ों गाड़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन बहुत कम लोग रुकने की जहमत उठाते हैं। यह संवेदनहीनता सिर्फ इसलिए नहीं है कि लोग मदद नहीं करना चाहते, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा डर पुलिस की पूछताछ और कानूनी पचड़ों में फंसने का भी रहा है।

 

'गोल्डन आवर' (Golden Hour) का महत्व: समय ही जीवन है

मेडिकल साइंस में 'गोल्डन आवर' (Golden Hour) का बहुत महत्व है। सड़क दुर्घटना होने के बाद का पहला एक घंटा (60 मिनट) 'गोल्डन आवर' कहलाता है। अगर इस एक घंटे के भीतर घायल व्यक्ति को सही प्राथमिक उपचार (First Aid) और अस्पताल की सुविधा मिल जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

 

दुर्भाग्य से, मदद करने में होने वाली देरी के कारण कई लोग इस 'गोल्डन आवर' में ही दम तोड़ देते हैं। ऐसे में अगर वहां मौजूद कोई भी नागरिक तुरंत सतर्कता दिखाए और मदद के लिए आगे आए, तो किसी के घर का चिराग बुझने से बचाया जा सकता है।

 

पुलिस का डर खत्म! जानिए 'गुड सेमेरिटन कानून' (Good Samaritan Law) क्या है?

लंबे समय तक लोग घायलों की मदद करने से कतराते थे क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस उन्हें ही संदिग्ध मान लेगी या बार-बार गवाही के लिए कोर्ट बुलाएगी। इस गंभीर समस्या को समझते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्देश पर 'गुड सेमेरिटन लॉ' (नेक मददगार कानून) लागू किया गया।

 

इस कानून के तहत आम नागरिकों को मिलने वाले अधिकार:

  • पहचान गुप्त रखने का अधिकार: घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले व्यक्ति को अपना नाम या पहचान बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • कोई पुलिस पूछताछ नहीं: नेक मददगार से पुलिस द्वारा कोई भी बेवजह पूछताछ नहीं की जा सकती। यदि वह खुद चश्मदीद गवाह बनना चाहता है, तो यह उसकी मर्जी पर निर्भर है।
  • अस्पताल नहीं मांग सकता पैसे: घायल को इमरजेंसी में भर्ती कराते समय अस्पताल प्रबंधन मददगार से इलाज का खर्च या कोई रजिस्ट्रेशन फीस नहीं मांग सकता। अस्पताल का पहला काम घायल का इलाज शुरू करना है।
  • सम्मान और इनाम: केंद्र सरकार ने एक योजना भी शुरू की है जिसके तहत गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को 'गोल्डन आवर' में अस्पताल पहुंचाकर उसकी जान बचाने वाले 'गुड सेमेरिटन' को प्रशस्ति पत्र और नकद इनाम देकर सम्मानित किया जाता है।

 

दुर्घटना होने पर तुरंत क्या करें? 108 और 112 की अहम भूमिका

अगर आप कभी रास्ते में किसी सड़क हादसे का शिकार हुए व्यक्ति को देखें, तो घबराएं नहीं और न ही वहां से भागें। आपका संयम और एक फोन कॉल चमत्कार कर सकता है।

 

  1. तुरंत 112 (Emergency Police) डायल करें: भारत में अब पुलिस, फायर ब्रिगेड और अन्य आपातकालीन सेवाओं के लिए '112' एक एकीकृत (Integrated) नंबर है। दुर्घटना देखते ही सबसे पहले 112 पर कॉल करें। उन्हें सटीक लोकेशन, घायलों की संख्या और स्थिति की जानकारी दें।
  2. 108 (Ambulance) को बुलाएं: मेडिकल इमरजेंसी के लिए 108 डायल करें। एंबुलेंस में पैरामेडिकल स्टाफ मौजूद होता है जो रास्ते में ही घायल की जान बचाने के लिए जरूरी लाइफ सपोर्ट सिस्टम शुरू कर सकता है।
  3. सुरक्षित घेरा बनाएं: जब तक पुलिस या एंबुलेंस न आए, घायल को सड़क के बीच से हटाकर सुरक्षित किनारे पर लाएं ताकि कोई और वाहन उसे टक्कर न मार दे।
  4. प्राथमिक मदद (First Aid): अगर आपको फर्स्ट एड की जानकारी है, तो खून बहने से रोकने के लिए किसी साफ कपड़े से घाव को दबाएं। घायल को पानी न पिलाएं, खासकर अगर उसे सिर में चोट लगी हो।

 

वीडियो बनाने की मानसिकता से बाहर निकलें

आज के डिजिटल युग में एक बेहद शर्मनाक और अमानवीय प्रवृत्ति (Trend) देखने को मिल रही है। दुर्घटना होने पर लोग मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने के बजाय अपनी जेब से स्मार्टफोन निकालते हैं और वीडियो बनाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' और 'व्यूज' पाने की यह भूख इंसानियत का गला घोंट रही है।

 

हमें इस मानसिकता को बदलना होगा। जरा सोचिए, अगर सड़क पर तड़पता हुआ वह व्यक्ति आपका अपना कोई सगा संबंधी हो, तो क्या तब भी आप खड़े होकर वीडियो बनाएंगे? पीड़ित की निजता (Privacy) का सम्मान करें और वीडियो बनाने के बजाय अपना समय 108 या 112 को कॉल करने में लगाएं। आपका मोबाइल फोन किसी की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है, बशर्ते आप उसका सही इस्तेमाल करें।

 

आइए, इंसानियत की मिसाल बनें

सड़कें हम सभी की हैं और सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हम सभी पर समान रूप से लागू होती है। हर बार प्रशासन या सरकार को कोसने से जिंदगियां नहीं बचेंगी। बदलाव की शुरुआत हमारे अपने व्यवहार से होती है।

 

हर सुपरहीरो के पास सच में कोई केप नहीं होती। असली हीरो वही है जो संकट की घड़ी में निस्वार्थ भाव से इंसानियत का हाथ आगे बढ़ाता है। अगली बार जब आप सड़क पर हों और कोई मदद के लिए पुकारे, तो मुंह न फेरें। रुकें, 112 या 108 पर कॉल करें, और उस व्यक्ति को नया जीवन देने में अपना योगदान दें। क्योंकि जो जान बचाता है, वही असली सुपरहीरो कहलाता है।
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